Page 244 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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संध्या म, म अपने पूवजों को नमन करता ह ाँ और अपनी आने वाली पीढी को
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यह संदेश देता ह ाँ मक संघर् ही सफलता की एकमात्र कुं जी है।
"कलम अभी थकी नहीं है, हौसला अभी जवान है,
अभी तो नापी है मुठॎठी भर ज़मीन, आगे सारा आसमान है।"
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"मशखर पर नाम भल ही मेरा हो, पर नींव में पत्थर इनक हैं, मेरी
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उडान क पीछ मछप, मज़बूत फौलादी पर इनक हैं।"
"ये पााँच नाम नहीं, पााँच तत्व हैं मेरी पहचान क, इन्हीं क क ं धों
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पर मटक हैं, ये ममन्दर ज्ञान क।"
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"अकला व्यमि कवल सपना देख सकता है, पर उस सपन में
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हकीकत क रंग, वफादार साथी ही भरते हैं।"
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"संस्था की दीवारों में मसफ ईट नहीं, इनका पसीना बोलता है,
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जब नायक मौन होता है, तब इनका अटूट 'कमष' बोलता है।"
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