Page 239 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                                      कृतज्ञता का महासागर


                                 मजनक क ं धों पर मेरा आकाश है
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                                                             ैं
                                                                 े
                     आत्मकथा की इस यात्रा को मलखत समय जब म पीछ मुडकर देखता
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              ह ाँ, तो मुझ अपना जीवन मकसी एकांत पमथक की यात्रा नहीं, बमल्क एक मवशाल
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                                                                      े
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              कारवां की तरह नज़र आता है। यमद आज म डॉ. अनार मसंह ठाकुर क ऱूप म  ें
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              समाज क सामने खडा ह ाँ, तो इसक पीछ उन अनमगनत हाथों का सहारा है,
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              मजन्होंने मगरत समय मुझ थामा और चलत समय मरा हौसला बढाया।
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                     भ्रातृ प्रेम: नींव क पत्थर
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                     मेर जीवन की आधारमशला मेर भाइयों ने रखी। मपता क साये क उठ
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              जाने क बाद बड भाई सज्जन मसंह ठाक ु र जी ने मजस तरह अपनी छाया म मुझ  े
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              पाला, वह मकसी तपस्या से कम नहीं था। मेर सातों भाइयों और पााँचों बहनों का
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              वह अटूट स्नेह ही था, मजसने मुझ अभावों म भी कभी टूटने नहीं मदया। छोट भाई
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              सुमेर मसंह ठाक ु र का वह साथ, जो पीएचडी की मडग्री लेने मदल्ली तक मेर साथ
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              रहा, मेर मलए भाईचार की सबसे बडी ममसाल है। मानमसंह ठाक ु र जी और उनकी
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              मदवंगत धमपत्नी (मरी भाभी मां) का वह बरडू वाला घर, जहााँ हमेशा स्नेह की
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              छांव ममली, मर जीवन का सबस सुरमक्षत कोना रहा है।
                     सहधममषणी: मौन साधना
                     मेरी सफलता का एक बडा महस्सा मेरी पत्नी ममता ठाक ु र क नाम है।
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              घर की मजम्मदाररयों को कुशलता स सभालत हुए उन्होंने मुझ सामहमत्यक और
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              सामामजक कायों क मलए वह मानमसक शांमत और समय मदया, मजसक मबना न
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              तो मैं पीएचडी कर पाता और न ही 'जल चैंमपयन' बन पाता।
                     ममत्रों और सहयोमगयों का संबल
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