Page 236 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
एक सामूमहक मवजय गाथा
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इन पांचों महानुभावों की सबस बडी मवशर्ता यह रही मक इन्होंने कभी
खुद को 'कमषचारी' नहीं समझा, बमल्क इन संस्थानों को अपना 'पररवार' माना।
जब मैं शासकीय दामयत्वों या अन्य सामामजक कायों में व्यस्त रहा, तब इन पांचों
ने एक टीम क ऱूप म मरी अनुपमस्थमत को कभी महसूस नहीं होने मदया।
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आज जब म मुडकर देखता ह ाँ, तो पाता ह ाँ मक आनर मसंह का नाम भले
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ही संस्थापक क ऱूप म मलया जाता हो, लेमकन इस नाम की चमक दीपेंि,
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युवराज, ईश्वर, शमशकांत और ऋतुराज जस हीरों की वजह स है। इन लोगों ने न
कवल अपना समय मदया, बमल्क अपना पसीना और अपनी भावनाएं इन स्कूलों
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की दीवारों म चुनी हैं।
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मरी आत्मकथा का यह अंश इन सहयोमगयों क प्रमत मरी कृतज्ञता का
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एक छोटा सा प्रमाण है। नगर की सवश्रेष्ठता का मशखर इन्हीं क क ं धों पर मटका
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है। म ईश्वर स प्राथषना करता ह ाँ मक हमारा यह साथ सदैव बना रहे और हम ममलकर
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मशक्षा क क्षेत्र में नए कीमतषमान स्थामपत करते रहें।
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"अकला व्यमि कवल मवचार कर सकता है, लेमकन उस मवचार को
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धरातल पर उतारने क मलए मनष्ठावान सामथयों की सेना चामहए होती है। मेर पास
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वह सना इन पांच महारमथयों क ऱूप म है।"
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