Page 238 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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              की अलख जगानी हो, इन सभी सामथयों ने कदम से कदम ममलाकर मेरा साथ

                          े
              मदया। स्टाफ क प्रत्येक सदस्य का वह अनकहा सहयोग ही है, मजसने मुझ  े
                                          े
              सामामजक और सामहमत्यक कायों क मलए समय और संबल प्रदान मकया।
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                     मेरी ऊजाष का स्रोत: मेर छात्र
                                                       ैं
                     आभार की यह कडी अधूरी रहेगी यमद म अपनी मप्रय छात्राओं और
                               ाँ
              छात्रों का मजक्र न कऱू। उनकी उत्सुक आख और कुछ नया सीखने की ललक
                                               ाँ
                                                 ें
                                         ैं
              ही मरी असली प्रेरणा है। जब म उन्हें जल बचाने की शपथ मदलाता ह ाँ या
                  े
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                                                     ें
              अथषशास्त् क जमटल मसद्ांतों को सरल भार्ा म समझाता ह ाँ, तो उनका वह
              मवश्वास मुझ यह अहसास कराता है मक मरी महनत सफल हो रही है।
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                     कृतज्ञता का समापन
                     मवनॏयालय क इन गमलयारों में मबताया गया हर पल मेरी आत्मकथा का
                              े
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                                   ैं
              एक जीवंत महस्सा है। म हृदय स अपने प्राचायष, समस्त स्टाफ और अपने
              मवनॏयामथषयों का आभार व्यि करता ह ाँ। आप सभी क प्रेम और सहयोग ने ही डॉ.
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              अनार मसंह ठाकुर को इस योग्य बनाया मक वह समाज की सवा म अपना योगदान
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                                                                ें
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              दे सक।

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                     "मशक्षक अकला नहीं बढता, वह अपने साथ पूर मवनॏयालय की ऊजाष
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              और सहयोमगयों का मवश्वास लेकर चलता है।"


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