Page 240 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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ममत्रता का धन ईश्वर का सबसे बडा वरदान है। सुरि सधव, राज भंवर
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ठाक ु र, और वररष्ठ समाजसेवी मवमल क ु मार जैन जैसे ममत्रों ने कवल मेरा
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उत्साहवधषन ही नहीं मकया, बमल्क समय-समय पर अपने सुझावों स मरा माग ष
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प्रशस्त मकया। आप जस दोस्तों की उपमस्थमत ही मुझ कमठन समय म डट रहने
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की प्रेरणा देती है।
कायषक्षेत्र क सारथी
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मशक्षा क इस मंमदर (शासकीय कन्या उच्चतर माध्यममक मवनॏयालय
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टोंकखुदष) म मर सहयोगी और प्राचायष— चाहे वे कमल मसंह टांक जी हों या
अंमबका सोमानी जी— सभी ने एक पररवार की तरह मेरा साथ मदया। एक मशक्षक
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क ऱूप म मरी ऊजाष का स्रोत मरी व छात्राएं और मवनॏयाथी हैं, मजनक भमवष्य को
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सवारने की कोमशश म मने खुद को मनखारा है।
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आभार का अंमतम शब्द
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म उन सभी शुभमचंतकों, सहयोमगयों और क्षेत्र क गणमान्य नागररकों
का ऋणी ह ाँ, मजन्होंने मेरी छोटी-सी उपलमब्ध पर भी खुमशयां मनाई ं । आप सबका
मवश्वास ही मेरा सबसे बडा 'पुरस्कार' है।
"अकला चला था मंमज़ल की जामनब, मगर लोग ममलते गए और
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कारवां बनता गया।"
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