Page 11 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                                         भूममका

                     हर जीवन एक कहानी होती  है, और मरी कहानी भी क ुछ ऐसी ही है। यह
                                                   े
              कहानी न तो मकसी कल्पना से उपजी है, और न ही मकसी भव्य महल में मलखी गई
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              है। यह कहानी है मध्य प्रदेश क एक छोट स गाव स शुऱू हुई एक साधारण जीवन
              यात्रा की, मजसम मने संघर्, सफलता, और अनमगनत सबक सीखे। यह आत्मकथा
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              मलखने का मेरा एक ही उद्देश्य है: मेर पररवार, मेर दोस्तों और मेर मवनॏयामथषयों को यह
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              बताना मक डॉ. अनार मसंह ठाक ुर, मजसक साथ वे आज जुड हैं, उसकी नींव में कौन-
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              सी ममट्टी और कौन-स संस्कार हैं। म चाहता ह ाँ मक वे मरी यात्रा स प्ररणा लें, यह समझें
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              मक कस एक साधारण पृष्ठभूमम का लडका अपने सपनों को पूरा कर सकता है।
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              मर जीवन का सबस बडा मोड और सबस बडी चुनौती तब आई, जब मैं अपनी
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              प्राथममक मशक्षा क दौरान था और मेर मपता, श्री प्रह्लाद मसंह ठाक ुर, हमें छोडकर स्वगष
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              मसधार गए। उस समय एक मध्यमवगीय मकसान पररवार क मलए यह एक बहुत बडा
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              आघात था। लेमकन मेरी माताजी, श्रीमती कशर बाई ठाक ुर, ने हार नहीं मानी। उन्होंने
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              अपनी महम्मत और धयष स पररवार को संभाला। मर बड भैया, श्री सज्जन मसंह ठाक ुर,
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              ने मपता की अनुपमस्थमत म एक अमभभावक की मजम्मदारी संभाली। इन दोनों ने
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              ममलकर मुझ और मर भमवष्य को संवारा। उनका त्याग, उनका समपषण और उनका
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              अटूट मवश्वास ही मर जीवन की सबस बडी पूंजी है।
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                     यही से, आनंद मसंह ठाक ुर का सफर, डॉ. अनार मसंह ठाक ुर बनने की ओर
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              शुऱू हुआ। यह कहानी कवल मरी नहीं, बमल्क उन सभी लोगों की है, मजन्होंने मुझ  े
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              हर कदम पर सहयोग मदया। यह कहानी मर गुरुओं क आशीवाद, मेर पररवार क त्याग
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              और मर दोस्तों क साथ मबताए यादगार पलों की है। म आशा करता ह ाँ मक यह
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              आत्मकथा आप सभी को अपने सपनों का पीछा करने की महम्मत देगी।
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