Page 16 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              एक वटवृक्ष की परछाई: मेर पूज्य मपता श्री प्रहलाद मसंह पटल
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                  जीवन में क ु छ ररश्त ऐस होत हैं मजनकी परछाई हमेशा हमार साथ रहती है,
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              भले ही वह व्यमि हमार साथ न हो। मेर मलए, मेर पूज्य मपता श्री प्रहलाद मसंह
              पटल का अमस्तत्व भी क ु छ ऐसा ही था। उनका मनधन तब हुआ जब मैं बहुत
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              छोटा था, मुमश्कल स चार या पााँच साल का। मेर पास उनकी बहुत कम, धुधली
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              सी यादें हैं, जो एक सपने की तरह मेर ज़हन में आती हैं और चली जाती हैं।
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              लेमकन, मेरी सबसे गहरी यादें और उनक व्यमित्व की सबसे सच्ची तस्वीर, उन
              कहामनयों और मकस्सों में बसी है जो मैंने गााँव क लोगों और अपने पररवार क
                                                                            े
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              सदस्यों स सुनी हैं। मेर मलए, वह मसर्फ एक मपता नहीं, बमल्क एक ऐसा वटवृक्ष
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              थे मजसकी जड गााँव की ज़मीन में बहुत गहरी थीं और मजसकी छाया में पूरा गााँव
              सुक ू न पाता था।
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                  हमार गााँव बरदु में, मेर मपता मसर्फ एक व्यमि नहीं, बमल्क एक संस्था थे।
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                                                                   े
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              उन्हें सब लोग 'वसूल पटल' और गााँव का 'मुमखया' कहकर पुकारत थे। यह पद
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              कवल नाम क मलए नहीं था, बमल्क यह उनक सम्मान, उनकी ईमानदारी और
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              उनक साहस का प्रतीक था। लोग बताते हैं मक उनका व्यमित्व एक ऐसे लोहे
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                                                            पुरुर्  की  तरह  था,
                                                            मजसने  देश  की
                                                                            े
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                                                            आज़ादी क समय क
                                                            संघर्ों  को  बहुत
                                                            करीब  से  देखा  था।
                                                            उनक स्वभाव में एक
                                                                े
                                                            अजीब सी मनडरता
              थी, जो मकसी भी मुमश्कल स घबराती नहीं थी। उनकी आवाज़ में एक ऐसा
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