Page 17 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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              सम्मान था मक जब वे बोलते थे, तो सब लोग चुप हो जात थे। गााँव क लोग
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              कहते थे मक जब तक पटल साहब थे, गााँव में मकसी को कोई परशानी नहीं होती
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              थी। वह हर गरीब क दुुःख-सुख में हमेशा उनक साथ खड रहत थे।
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                  मेर मपता की दो सबसे बडी पहचान थीं: उनकी बंदूक और उनका घोडा। यह
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                                                                         े
                                                            दोनों  चीजें  कवल
                                                            उनकी  संपमत्त  नहीं,
                                                                            े
                                                            बमल्क       उनक
                                                            व्यमित्व का महस्सा
                                                            थीं।  उनकी  बंदूक

                                                            उनकी  बहादुरी  और
                                                            साहस  का  प्रतीक

                                                                  े
                                                                      ै
              थी। यह बंदूक कवल आत्मरक्षा क मलए नहीं, बमल्क उस समय क डकतों और
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              अपरामधयों से गााँव की रक्षा क मलए भी इस्तेमाल होती थी। लोग बताते हैं मक
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              जब  मेर  मपता  अपनी  बंदूक  लकर  घोड  पर  सवार  होकर  मनकलत  थे,  तो
              अपरामधयों की ऱूह कााँप जाती थी। वह एक क ु शल घुडसवार थे। घुडसवारी
                                                                े
              उनका जुनून था, उनका शौक था। गााँव क लोग उन्हें अक्सर घोड पर सवार होकर
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                                                                            े
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              खेतों की ओर या मकसी ज़ऱूरी काम स जात हुए देखत थे। उनका घोडा भी उनक
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              स्वभाव की तरह ही तज़ और मनडर था। यह देखकर मुझे हमेशा गवष महसूस होता
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              है मक मेर मपता एक ऐसे व्यमित्व क मामलक थे।
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                  उनकी वीरता और न्यायमप्रयता क मकस्स पूर इलाक में मशह र थे। आस-
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              पास क गााँवों क लोग अपने झगडों और मववादों को सुलझाने क मलए उनक
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              पास आते थे। उनक दरबार में मसर्फ वही लोग नहीं आते थे जो अमीर थे, बमल्क
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              हर वगष क लोग—अमीर-गरीब, मज़दूर-मकसान—सब आते थे। उनका न्याय
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