Page 20 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
बचपन की एक यादगार कहानी: गुब्बार स जुडा प्रम
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हर व्यमि क जीवन में बचपन का एक ऐसा कोना होता है, जहााँ मसर्फ
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यादें ही नहीं, बमल्क सबस गहर ररश्त और सबस बडी सीख भी छुपी होती है।
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मेर मलए, वह कोना मर छोट भाई सुमर मसंह ठाकुर क साथ जुडी शरारतों,
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लडाइयों और बइंतहा प्रेम स भरा हुआ है। हम दोनों म हमशा एक अजीब सा
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मुकाबला रहता था। म उसस दो साल बडा था, लेमकन वह घर का सबसे छोटा
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और सबस दुलारा था। यह बात
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कभी-कभी हमार झगडों का
कारण बन जाती थी, क्योंमक
उसे सबकी तरर्फ से ज़्यादा प्यार
ममलता था और मुझ लगता था
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मक उसका पक्ष हमेशा मलया
जाता है। लेमकन इन छोटी-मोटी
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नोक-झोंक क बावजूद, हमार े
बीच एक ऐसा अटूट बंधन था,
जो मकसी भी झगड से कहीं
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ज़्यादा मज़बूत था।
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यह बात उस समय की है जब म सात साल का था और सुमर पााँच साल
का। हम दोनों अपने गााँव बरदु में अपने घर की गली में खेल रहे थे। दोपहर का
शांत समय था, और गााँव में अक्सर इस समय कोई हलचल नहीं होती थी। तभी
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अचानक गली क नुक्कड स एक आवाज़ सुनाई दी—"गुब्बार... ल लो गुब्बार!"
वह आवाज़ मकसी जादू की तरह थी। उस समय गुब्बार जसी रंगीन चीज़ ें
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हमार जैसे गााँव क बच्चों क मलए मकसी ख़ज़ाने से कम नहीं थीं। हम दोनों भाई
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