Page 24 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              हाँसते थे, एक-दूसर को परशान करत थे, और कभी-कभी तो छोटी-मोटी लडाई
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              भी हो जाती थी।
                     यह घटना 8 अगस्त, 1979 की है, जब बाररश का मौसम था। दोपहर

              का समय था, और हम सब कमर में अपनी-अपनी मकताबें लेकर बैठ थे। तभी
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              अचानक हमार बड भाई कुमर मसंह और चचेर भाई बजमसंह कहीं स कुछ अजीब
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              सी चीज़ लकर आ गए। व बोररंग क टोट  (मजन्हें हम डायनामाइट कहत थे)
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              अपने साथ लाए थे। उनकी आाँखों में शरारत की चमक थी। वे दोनों हम सबसे
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              बड थे, करीब 13 साल क, और उनक मन में एक मवचार आया—इन टुकडों स  े
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              बाऱूद मनकालकर दीपावली पर बम बनाएाँगे।
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                     यह सुनकर हम सब उत्सामहत हो गए। हम नहीं पता था मक यह मकतना
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              खतरनाक था। हम सब ने ममलकर बाऱूद मनकालने का काम शुऱू मकया। कुमर
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              मसंह और बजमसंह ने उन टुकडों म स बाऱूद मनकालने की कोमशश की। हम सब
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              उत्सुकता स उन्हें देख रहे थे, लमकन तभी अचानक एक ज़ोरदार धमाका हुआ।
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              पूरी हवली दहल गई। हम कुछ समझ नहीं आया मक क्या हुआ, लेमकन धमाक
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              की आवाज़ ने सब कुछ रोक मदया। चारों तरर्फ धुआ, धूल और ज़ोरदार शोर था।
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              हम सब हैरान थे और डर से कााँप रहे थे।
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                     जब धूल छटी, तो हमने देखा मक कुमर मसंह और बजमसंह को बहुत
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              गहरी चोट आई थी। उनक शरीर स खून मनकल रहा था और व ददष स तडप रहे
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              थे। म और सुमर भी वहीं पास म थे, हमें भी हल्की चोट आई थी, लेमकन हम
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              दोनों पूरी तरह सुरमक्षत थे। हमारी चीख सुनकर गााँव क लोग हमारी हवली क
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              पास एकमत्रत हो गए। उन्होंने तुरंत हमारी मदद की और हम इलाज क मलए ल  े
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              जाने का फसला मकया। उस समय हमार गााँव क पास मसर्फ एक ही कस्बा था,
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                                    ें
              बेरछा, जो शाजापुर मजल म था। वहााँ जाने क मलए कोई आधुमनक वाहन नहीं
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