Page 29 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              सने कपड, चोट और पसीना हमार बचपन का महस्सा थे। हर शाम जब खेल
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              खत्म होता था, तो हमार चेहर पर एक जीत की खुशी और संतोर् होता था, भले
              ही हम हार गए हों।
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                     लेमकन सबसे यादगार पल वे थे, जब हम दोस्तों क साथ खतों म घूमने
              मनकलत थे। गमी की दोपहर हो या शाम का सुहावना मौसम, हम अक्सर खेतों
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              पर जाकर मक्क क भुट्ट तोडत और उन्हें आग म भूनकर खात थे। भुट्ट का स्वाद
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              और उस पर लगी नमक-ममचष, आज भी मरी जुबान पर महसूस होती है। इसी
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              तरह, जब खेतों में चने लगे होते थे, तो हम उन्हें तोडकर खाते थे। उस ताज़े चने
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              का स्वाद, मजस हम अपनी मुठॎठी म भरकर लात थे, दुमनया क मकसी भी पकवान
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              से बेहतर लगता था। यह कवल खाना नहीं था, बमल्क प्रकृमत क साथ सीधा
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              जुडाव था।
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                     मर मशक्षक का मर काम पर खुश होना, मर मलए मकसी पुरस्कार स कम
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              नहीं था। जब म कोई पाठ याद करक सुनाता था, या कोई सवाल हल करता था,
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              और मर मशक्षक क चेहर पर संतोर् की मुस्कान मदखती थी, तो मेरा मन गवष और
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              खुशी स भर जाता था। उनकी वह प्रशंसा मर मलए सबस बडी प्रेरणा थी। यह
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              एहसास मुझ यह मसखाता था मक कडी महनत और लगन स ममली सराहना का
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              महत्व मकतना अमधक होता है।
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                     ये सभी पल मेर बचपन क अनमोल मोती हैं, जो मेर व्यमित्व की माला
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              म मपरोए हुए हैं। ये यादें मुझ हमशा मरी जडों स जोड रखती हैं और यह याद
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              मदलाती हैं मक जीवन की सबस बडी खुमशयााँ, सबसे सरल और सच्चे पलों में
              ही मछपी होती हैं।
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