Page 33 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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प्राथममक मशक्षा की मजबूत नींव पर खडा हो चुका था, और अब ये मशक्षक मेर े
जीवन को एक नई मदशा देने क मलए तैयार थे।
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श्री बुलचंद छावडी सर का व्यमित्व बहुत ही प्रेरणादायक था। उनका
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अनुशासन और समपषण अमितीय था। वह हम कवल मवर्य नहीं पढात थे, बमल्क
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जीवन की व्यावहाररक समस्याओं का सामना करना भी मसखात थे। उनकी कक्षा
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में हर छात्र को अपनी बात रखने का अवसर ममलता था, मजसस हमार अंदर
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आत्ममवश्वास पैदा हुआ। वह हमशा हम प्रोत्सामहत करत थे मक हम अपने सपनों
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को पूरा करने क मलए कडी महनत कर।
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इसी तरह, श्री अमृत लाल परासर सर ने भी मेर जीवन पर अममट छाप
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छोडी। उनका ज्ञान और मवर्यों पर उनकी पकड अद्भुत थी। वह हम ऐस पढात े
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थे जैसे हम मकसी जमटल मवर्य को नहीं, बमल्क मकसी रोचक कहानी को सुन
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रहे हों। परासर सर की वजह स मुझ पढाई म और भी गहरी रुमच हुई और मने
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मवर्यों को मसफ याद करने की बजाय, उन्हें समझने की कोमशश की। उन्होंने मुझ े
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यह मसखाया मक ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और हमें हमेशा सीखने क मलए
तत्पर रहना चामहए।
ये तीनों मशक्षक मर जीवन क आधार स्तंभ हैं। श्री सोलंकी सर ने मर े
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बचपन को ज्ञान से भरा, और श्री छावडी एवं श्री परासर सर ने मरी युवावस्था
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को मदशा दी। उनक मदए हुए संस्कार और मशक्षाएं आज भी मर साथ हैं, और मैं
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हमशा उनक प्रमत कृतज्ञ रह ाँगा।
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