Page 38 - आनंद से अनार तक
P. 38

आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
                                                 े

                     वह कीचड भरा रास्ता, रमू दा की कडवी बात, और दोपहर 3 बजे

                                             े
                                                                       े
              स्कूल पहुाँचना—यह सब आज भी मेर ज़हन में ताज़ा है। यह घटना मेर जीवन
                                                            ें
                                                                 े
              का एक ऐसा मोड थी मजसने मुझ मसखाया मक जीवन म आग बढने क मलए
                                         े
                                                                        े
                                                        े
                                                       े
              बहुत त्याग और समपषण की ज़ऱूरत होती है। इसने मर इरादों को और भी मज़बूत
              कर मदया और मुझ यह मसखाया मक हर मुमश्कल का सामना महम्मत से मकया जा
                             े
              सकता है.
                     =================================

                                                               ें
                      ें
                                           ें
                "पैरों म कीचड़ था और जेब म खालीपन, पर आँखों म साफ़
                मंज़िल थी, वो एक रुपय की कमी ही आज मेरी कामयाबी की
                                     े
                सबसे बड़ी दलील थी।"
                                    े
                "रास्तों की दुश्वाररयों न हम बीच राह म उतारा ़िऱूर था, पर उसी
                                                   ें
                                        ें
                                                    े
                       े
                कीचड़ न ससखाया कक सिखर तक पहँचन का अपना ही दस्तूर
                                                 ु
                था।"
                  ं
                "नग पाव और कीचड़ स लथपथ वो तीन बजे का स्क ू ल पहँचना,
                    े
                                     े
                       ँ
                                                                     ु
                                                     ै
                ससखा गया कक मंज़िल उनहीं को समलती ह जो जानते ह गगरकर
                                                                 ैं
                संभलना।"
                         े
                "कीचड़ भर रास्तों ने जब थकाया, तो हमने इरादों को और धार
                                      े
                        े
                                                 े
                दी, घर स दूर रहकर पढ़न की ज़िद न ही, सपनों को एक नई
                रफ़्तार दी।"



              28 | P a g e
   33   34   35   36   37   38   39   40   41   42   43