Page 41 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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झाड ़ू -पोछा और खाना बनाने क बाद हमार पास पढने क मलए बहुत
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कम समय बचता था, लमकन हम उस समय का सदुपयोग करत थे। हम तीनों रात
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को देर तक पढते, एक-दूसर को सवाल पूछत और एक-दूसर की मदद करत थे।
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उस छोट से कमर में हमारी पढाई, हमारी शरारतें और हमार सपने एक साथ पल
रहे थे। वह कमरा हमार मलए मसफ एक घर नहीं, बमल्क एक पाठशाला और एक
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प्रयोगशाला बन गया था।
उस समय हम बहुत मुमश्कलों का सामना करना पडा था। हमार पास
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पैसे कम थे, खाना कभी-कभी अच्छा नहीं बनता था, और हम घर की बहुत याद
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आती थी। लमकन आज जब म उन मदनों को याद करता ह ाँ, तो मुझ बहुत खुशी
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और सुकून ममलता है। उन मदनों हमने जो जीवन क सबक सीख, वे मकसी मकताब
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में नहीं ममलते। हमने सीखा मक एक-दूसर का साथ कस मदया जाता है, कसे
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मुमश्कलों का सामना मकया जाता है, और कसे आत्ममनभषर बना जाता है। उस
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अनुभव ने हम एक-दूसर क प्रमत और भी ज़्यादा प्रेम और सम्मान मसखाया।
आज भी, जब हम तीनों दोस्त ममलते हैं, तो हम उन मदनों को याद करक
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बहुत हाँसत हैं। हम सब ने अपने-अपने जीवन में सफलता हामसल की है, लेमकन
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हमार ररश्ते की नींव उस छोटे से मकराये क कमर में ही रखी गई थी। मनोहर आज
एक सफल मकशन है, सुमरमसंह मशवम् मप्रंटस स अपनी मज़ंदगी म कामयाब है,
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और म अपने ममशन म लगा हुआ ह ाँ। हम तीनों म आज भी वही गहरा प्रेम है जो
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उस समय था। वह छोटा सा कमरा, और हाथ की बनी हुई रोमटयााँ—यह सब मेर े
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जीवन का एक ऐसा अनमोल महस्सा है, मजस म कभी नहीं भूल सकता।
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