Page 43 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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एक मकान खरीद लो। इसस तुम्हार पररवार को शहर म रहने और बच्चों को
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अच्छी मशक्षा देने म मदद ममलगी।" यह सुनकर मर भाई और हम सब हैरान थे।
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हमार पास इतने पैसे नहीं थे मक हम एक मकान खरीद सक। लेमकन श्री शमाष जी
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ने कवल सलाह नहीं दी, बमल्क उन्होंने हमें पैसे भी मदए। उन्होंने हमें भरोसा
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मदलाया मक हम इस काम को कर सकते हैं। उन्हीं की महम्मत और पैसों से हमने
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टोंक खुदष म वह मकान खरीदा, जो आज मर छोट भाई सुमर मसंह क पास है। यह
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हमार पररवार क मलए एक बहुत बडा कदम था। इस कदम ने हम गााँव की
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सीममतता से बाहर मनकलकर एक नई दुमनया देखने का मौका मदया।
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इसक बाद, साल 1992 में, हमार सामने एक और बडा अवसर आया।
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गााँव बरदु म भोरासा क बाबूलाल राठौर अपनी 87 बीघा ज़मीन बेच रहे थे।
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हमार पररवार की संख्या क महसाब स हमार पास खती की ज़मीन कम थी। मर े
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बड भाई ने वह ज़मीन खरीदने का मवचार मकया, लेमकन इस बार भी सबसे बडी
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चुनौती पैसों की थी। उस समय 87 बीघा ज़मीन खरीदना हमार मलए एक बहुत
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बडा सपना था, जो हमारी पहुाँच स बहुत दूर था। लमकन मफर स, श्री कन्हैयालाल
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शमाष जी ने हमारी मदद की। उन्होंने हम महम्मत दी और पैसों का भी इंतज़ाम
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मकया। उन्होंने हमें कहा, "यह ज़मीन तुम्हार पररवार क भमवष्य क मलए बहुत
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ज़ऱूरी है। तुम सब ममलकर महनत करोग तो यह पैसा वापस चुका दोग।"
यह सुनकर हमार अंदर एक नई ऊजाष आ गई। हमने उनकी बात पर
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मवश्वास मकया और वह ज़मीन खरीद ली। आज जब मैं उस ज़मीन पर खडी
फसल को देखता ह ाँ, तो मुझ श्री शमाष जी की दूरदमशता पर बहुत गव होता है।
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उन्होंने हमार पररवार क भमवष्य क मलए एक ऐसी नींव रखी थी, मजसक मबना
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हमारा आज का अमस्तत्व संभव नहीं था। उन्होंने हम कवल पैस नहीं मदए, बमल्क
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उन्होंने हमें अपनी कामबमलयत पर मवश्वास करना भी मसखाया।
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