Page 47 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
जीवन का सबसे बडा मोड: एक मनराशाजनक पररणाम
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सन् 1992 में, जब मैंने हायर सेकडरी की परीक्षा उत्तीणष की, तो मेर े
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सामने भमवष्य का एक नया रास्ता खुल गया था। गााँव और छोट शहर क माहौल
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स मनकलकर म इंदौर जस बड शहर म प्रमतयोगी परीक्षा पी.ई.टी. (प्री-
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इंजीमनयररंग टस्ट) की तयारी कर रहा था। उस समय इंजीमनयररंग कॉलज म प्रवश
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पाना हर मवनॏयाथी का सपना होता था, और मेर मलए भी यह एक बडा लक्ष्य था।
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मने पूरी लगन और महनत स तयारी की। मर मन म यह मवश्वास था मक मरी
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महनत जऱूर रंग लाएगी। म घंटों तक पढाई करता, जमटल समस्याओं को
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सुलझाता, और सपनों की एक दुमनया म खोया रहता था, जहााँ मैं एक सफल
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इंजीमनयर क ऱूप म खुद को देखता था।
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परीक्षा देने क बाद, मुझ अपने प्रदशन पर पूरा भरोसा था। मुझ यकीन
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था मक म अच्छ अंकों स उत्तीण हो जाऊगा और मुझ मकसी अच्छ इंजीमनयररंग
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कॉलेज में प्रवेश
ममल जाएगा।
मेर े पररवार,
दोस्तों और
मशक्षकों की
उम्मीदें भी
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मुझस जुडी हुई
थीं। जब पररणाम घोमर्त हुआ, तो मेर मदल में एक अजीब सी हलचल थी। मैंने
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बड उत्साह से अपना पररणाम देखा, लेमकन जो सामने आया, उसने मुझ महलाकर
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रख मदया।
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