Page 42 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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एक अनमोल फररश्ता : श्री कन्हैयालाल शमा ष
जीवन क कुछ मोड ऐस होत हैं, जहााँ हमें ऐसे लोग ममलते हैं जो हमारी
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राह को पूरी तरह बदल देत हैं। व न कवल हमारा मागदशन करत हैं, बमल्क हमें
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वह महम्मत भी देते हैं मजसकी हमें सबसे ज्यादा ज़ऱूरत होती है। मेर जीवन में भी
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ऐस ही एक इंसान थे, मजनका नाम था श्री कन्हैयालाल शमाष जी। वे मेर बड भाई
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श्री सज्जन मसंह ठाक ु र क घमनष्ठ ममत्र थे, लमकन उनका साथ हमार पूर पररवार
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क मलए मकसी वरदान स कम नहीं था। यह कहानी है हमार पररवार क संघर् और
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श्री शमाष जी क अटूट मवश्वास की, मजसने हमारी मज़ंदगी की मदशा बदल दी।
यह बात तब की है जब मैं कक्षा दसवीं में पढ रहा था, और हमारा
पररवार आमथषक ऱूप स बहुत मज़बूत नहीं था। गााँव म खती थी, लेमकन पररवार
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की संख्या बहुत बडी
थी, इसमलए आय
सीममत थी। हम सब
एक साथ रहते थे,
और हर मदन हमारा
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संघर् हमारी आखों
क सामने था। ऐसे
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मुमश्कल समय म, श्री कन्हैयालाल शमाष जी हमार पररवार क मलए एक सहारा
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बनकर आए। व उस समय दीवानजी की नौकरी करत थे और उनक पास बहुत
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अनुभव और समझदारी थी। व हमशा हमार पररवार की आमथषक मस्थमत को
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सुधारने क बार म सोचत थे।
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वर् 1990 में, जब हम गााँव में रहते थे, तो श्री शमाष जी ने मेर बड भाई
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को एक बहुत ही महत्वपूण सलाह दी। उन्होंने उनस कहा, "सज्जन, टोंक खुदष म ें
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