Page 39 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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                                                             े
                                                                  े
                       मशक्षा क मलए एक नई शुरुआत: मकराय क कमर का सफर
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                     गााँव बरदु से टोंक खुदष तक का वह कीचड भरा रास्ता, रमू दा की कडवी
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              बात और दोपहर क तीन बज स्कूल पहुाँचना—वह मदन मेर मन में एक गहरी छाप
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              छोड गया था। उस घटना ने हम यह सोचने पर मजबूर कर मदया मक हम रोज़ाना
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                     ें
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              कीचड म धाँसत हुए और बइज्जती सहत हुए अपनी पढाई जारी नहीं रख सकत।
              हमारा हौसला तो मज़बूत था, लेमकन यह रास्ता हमें मानमसक और शारीररक
              ऱूप से थका रहा था। हमने उस मदन ठान मलया मक चाहे जो हो जाए, हम अब
              टोंक खुदष म ही रहकर अपनी पढाई पूरी करग। यह एक बडा फसला था, क्योंमक
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              हमार पास इतना पैसा नहीं था मक म अकल मकराये पर रह सकू। लमकन कहत हैं
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                                                               ाँ
                                                                  े
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              ना, जब इरादे सच्चे होते हैं, तो रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं।
                     म जानता था मक यह सफर अकल तय नहीं हो सकता। मुझ सहार की
                                                                    े
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              ज़ऱूरत थी, और वह सहारा मुझ मर पररवार और दोस्तों म ममला। मर छोट भाई
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              सुमेरमसंह  ने तुरंत मरा साथ देने का फसला मकया। वह भी गााँव की इस परशानी
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                                                                   े
                                                                 स  तंग  आ
                                                                 चुका था और
                                                                 मेर  े  साथ
                                                                 रहकर  पढना
                                                                 चाहता  था।
                                                                        इसक
                                                                            े
                                                                     अलावा,
              हमारा एक और साथी था—गााँव बरदु का हमारा ममत्र मनोहर मसंह, मजसे आज
              सब लोग मनोहर वकील क नाम से जानते हैं। हम तीनों ने ममलकर एक बडा
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                                       ें
              कदम उठाया और टोंक खुदष म एक छोटा-सा कमरा मकराये पर ले मलया। यह
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