Page 36 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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मशक्षा का सफर: कीचड भर रास्त और एक मजबूत इरादा
हर कामयाब व्यमि की कहानी में एक ऐसा अध्याय ज़ऱूर होता है, जो
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संघर्ों और मुमश्कलों स भरा होता है। मर मलए, मरी मशक्षा का सफर भी कुछ
ऐसा ही था, जो गााँव बरदु से नगर टोंक खुदष तक फला हुआ था। आज जब म ैं
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पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो मुझ हाँसी भी आती है और आखों म नमी भी आ जाती
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है, क्योंमक उस रास्त ने मुझ मसफ ज्ञान नहीं, बमल्क जीवन क सबसे बड सबक
भी मसखाए।
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उस समय, गााँव स टोंक खुदष तक आने-जाने क मलए कोई पक्की सडक
नहीं थी। रास्ता कच्चा था और बाररश क मदनों में तो वह एक दलदल में बदल
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जाता था। कीचड इतना गहरा होता था मक पैदल चलना भी मुमश्कल हो जाता
था। हमार पैरों म जूत-चप्पल मटकते नहीं थे, और हम अक्सर नंग पैर ही इस
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दलदल को पार करत थे। यह सफर हमार मलए रोज़ाना की एक बडी चुनौती था।
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उस समय,
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हमार गााँव स टोंक खुदष
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तक आने-जाने क
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मलए एक मात्र सहारा
ओम जायसवाल
ठकदार का दूध वाहन
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था। इस वाहन को चलाने वाले हमार मलए मकसी फररश्ते से कम नहीं थे, उनका
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नाम था रमू दा। उनका दूध वाहन ही हमार मलए स्कूल जाने का एक मात्र साधन
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था। हालााँमक, इस वाहन में सफर का मकराया मात्र 1 रुपया था, जो उस समय
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हमार मलए बहुत अमधक था। हम जस छोट-से गााँव क बच्चों क मलए 1 रुपया
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बहुत बडी रकम थी, और अक्सर हमार पास यह मकराया देने क मलए पैसे नहीं
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