Page 32 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
गुरुओं का आशीवाद: मेर जीवन का मागषदशक
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मशक्षा का सफर कवल मकताबों तक सीममत नहीं होता, बमल्क यह उन
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गुरुओं क मागदशन स पूरा होता है जो ज्ञान की रोशनी स हमार जीवन क रास्तों
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को रोशन करत हैं। मर जीवन म भी कुछ ऐस ही महान मशक्षक थे, मजन्होंने मुझ
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पर गहरा असर डाला और मेर व्यमित्व को एक नई मदशा दी। मैं आज भी उनक
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मदए हुए संस्कारों और मशक्षाओं को अपने जीवन का सबस बडा धन मानता ह ाँ।
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मेरी प्राथममक मशक्षा क दौरान, मुझ श्री मंदऱूप मसंह सोलंकी जी का
सामनध्य ममला। वह मसफ एक मशक्षक नहीं, बमल्क मेर मलए एक मागषदशषक और
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प्रेरणा स्रोत थे।
उन्होंने हमें अक्षर
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ज्ञान क साथ-साथ
अनुशासन और
नैमतकता का पाठ भी
पढाया। उनका पढाने
का तरीका इतना
सरल और रोचक था मक पढाई कभी बोझ नहीं लगी। मुझ आज भी याद है, जब
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वह हम पढात समय कहामनयााँ सुनात थे, मजससे मवर्य और भी मजेदार हो जाता
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था। सोलंकी सर ने मर मन म पढने की जो लौ जलाई, वह मर पूर शमक्षक सफर
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म जलती रही। उन्होंने मुझ यह मसखाया मक मशक्षा मसफ परीक्षा पास करने क
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मलए नहीं, बमल्क जीवन को समझने क मलए होती है।
माध्यममक मशक्षा क चरण में, मेरा पररचय दो और महान मशक्षकों से
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हुआ: श्री बुलचंद छावडी और श्री अमृत लाल परासर। इस समय तक मैं अपनी
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