Page 28 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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बचपन क अनमोल मोती: बरद से जमोमनया
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तक का सफर
मेर बचपन की यादें, बरदु गााँव की ममट्टी की सौंधी खुशबू और जमोमनया
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क स्कूल की दीवारों म आज भी जीवंत हैं। उन मदनों की मजंदगी बहुत सरल थी,
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मगर उसका हर पल आनंद और उत्साह स भरा होता था। मर बचपन क सबस े
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यादगार पल मकसी बडी उपलमब्ध से नहीं, बमल्क साधारण सी खुमशयों स जुड े
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हैं।
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मवनॏयालय में सरस्वती पूजन का मदन मेर मलए सबसे खास होता था। वह
कवल एक पूजा नहीं, बमल्क ज्ञान और कला क प्रमत श्रद्ा का एक पवष था। उस
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मदन स्कूल का माहौल एकदम बदल जाता था। सभी बच्चे नए कपड पहनकर
आते, और पूरा स्कूल रंगीन कागज और फूलों स सजा होता था। हम सब ममलकर
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सरस्वती मााँ की प्रमतमा स्थामपत करते, भजन गाते और प्रसाद बााँटते। उस मदन
हम बच्चों म एक अलग ही खुशी और अपनापन महसूस होता था। यह वह मदन
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था जब हम सब ममलकर एक पमवत्र और सुंदर अनुभव को जीत थे।
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इसक बाद,
दोस्तों क साथ खेलना
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मेरी मदनचयाष का
सबस े महत्वपूण ष
महस्सा था। धीरज मसंह
चोपडा और मनोहर
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मसंह जागीरदार मेर सबसे अच्छ दोस्त थे। हमार खेल क मैदान खेतों की मेड ें
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और गााँव क खाली पड मैदान थे। हम खो-खो और कबड्डी खलत थे। धूल स े
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