Page 26 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
संघर्ष की छाव में: मा और भाई का साथ
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मेर जीवन की मकताब में, कुछ पन्ने ऐस हैं जो स्याही स नहीं, बमल्क
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आसुओं और अटूट प्रेम स मलख गए हैं। यह वह समय था जब मने जीवन की
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सबस बडी हामन का सामना मकया। म अभी प्राथममक मशक्षा क शुरुआती दौर म ें
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था, जब मेर मपता, श्री प्रह्लाद मसंह ठाक ु र, हमें छोडकर स्वगष लोक चले गए। एक
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मासूम बच्चे क मलए मपता का साया अचानक उठ जाना, जीवन की सबसे बडी
त्रासदी होती है। उस समय, मुझ यह पूरी तरह स समझ भी नहीं आया मक क्या
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हुआ है, लेमकन
घर का माहौल
और मेरी माता
की आाँखों में
मैंने जो उदासी
देखी, उसने मेर े
बाल मन पर
गहरी छाप छोडी।
लमकन जहााँ एक दरवाज़ा बंद हुआ, वहीं दो और मजबूत दीवार खडी
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हो गई ं । मर मपता क जाने क बाद, मेरी माता, श्रीमती कशर बाई ठाक ु र, ने अपनी
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सारी महम्मत और धैयष को बटोर मलया। वह एक ऐसी ढाल बन गई ं , मजसने हमें
हर मुमश्कल स बचाया। उन्होंने मसफ घर ही नहीं संभाला, बमल्क हमारी मशक्षा
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और परवररश की भी मजम्मेदारी उठाई। उनकी आाँखों में भले ही नमी होती थी,
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लेमकन उनक इरादों में कभी कोई कमी नहीं आई। वह हमें मसखाती थीं मक जीवन
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म आग बढना ही सबस बडी श्रद्ांजमल है। उनक संघर् और त्याग ने हम यह
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मसखाया मक प्रेम और महनत स हर चुनौती का सामना मकया जा सकता है।
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