Page 22 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              ददष स चीख पड। गुब्बार की लडाई अब पैरों म लग ज़ख्मों म बदल गई थी। खून
              मनकल रहा था और ददष असहनीय था।
                     हम दोनों का झगडा अब ख़त्म हो चुका था, लेमकन उसकी जगह हमार  े
              मन में एक-दूसर को चोट पहुाँचाने का पछतावा और ददष था। हमारी चीख सुनकर
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              माताजी और मपताजी तुरंत हमार पास आए। उन्होंने हमार पैरों को देखा और
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              तुरंत उनका उपचार मकया। लमकन मुझ याद है, उस समय डााँट से ज़्यादा हमें
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              अपने माता-मपता क चेहर पर आई मचंता और दुुःख ने परशान मकया।
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                     उस मदन क बाद हम दोनों भाई कुछ मदन तक एक-दूसर क पास जाने स  े
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              भी डर रहे थे। लेमकन जैसे-जैसे ज़ख्म ठीक होने लगे, हमार मन का गुस्सा भी
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              धीर-धीर ख़त्म होने लगा। वह एक ददषनाक घटना थी, लेमकन उसने हमें एक
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              बहुत बडा सबक मसखाया। हमने महसूस मकया मक मकसी भी चीज़ क मलए
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              झगडा करने से ज़्यादा ज़ऱूरी एक-दूसर का साथ है। हमार पैरों म वह घाव एक
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              मनशान छोड गया, जो आज भी है। यह मनशान मसर्फ एक चोट का नहीं है, बमल्क
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              यह हमार प्रेम और हमार ररश्ते की गहराई का प्रतीक है।
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                     आज भी, जब हम दोनों भाई एक-दूसर क पैरों को देखत हैं और वह
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              मनशान याद करते हैं, तो हमार चेहर पर एक मुस्कान आ जाती है। वह गुब्बार की
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              लडाई हमार बचपन की सबसे यादगार घटना बन गई है, मजसने हमें यह मसखाया
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              मक सच्चा प्यार क्या होता है। यह घटना हमार ररश्ते की नींव बन गई, मजस पर
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              हमारा प्रेम और मवश्वास और भी मज़बूत हो गया। हम दोनों भाई हमशा स एक-
              दूसर क साथ रहे हैं और हमारा प्रेम आज भी उतना ही गहरा है मजतना उस मदन
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              था।

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