Page 40 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
मसर्फ एक कमरा नहीं था, बमल्क यह हमार मलए आज़ादी, मजम्मेदारी और
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आत्ममनभरता की एक नई दुमनया थी।
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जब हम अपने उस छोटे से कमर में रहने आए, तो हमार सामने एक
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अलग ही चुनौती थी। घर म न माताजी थीं, न बहनें थीं, और न ही कोई और
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बडा-बुजुग था जो हमार मलए खाना बनाता या घर का काम करता। हम तीनों को
सब कुछ खुद ही करना था। हमारी मदनचयाष पूरी तरह स बदल गई थी। सुबह
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उठकर सबस पहल झाड ़ू लगाना, मफर बतन मांजना, और उसक बाद नहा-धोकर
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स्कूल क मलए तयार होना। यह सब हमार मलए मबल्कुल नया था। हमने गााँव म ें
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कभी ये काम नहीं मकए थे।
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सबस बडी चुनौती थी खाना बनाना। हम रोटी बनाना तो आता ही नहीं
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था। हम मुमश्कल स मकसी तरह गोल-मटोल रोमटयााँ बना लेते थे, जो अक्सर जल
जाती थीं या कच्ची रह जाती थीं। सब्ज़ी बनाने का भी हमारा अपना ही तरीका
था। हम सब एक साथ ममलकर सब्ज़ी काटते, और मफर कोई एक उसे बनाता।
हमारी समब्ज़यों में कभी नमक ज़्यादा होता, तो कभी कम, लेमकन हम सब
ममलकर उसे खा लेते थे। हमें उस खाने में भी एक अलग ही स्वाद ममलता था,
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क्योंमक वह हमार खुद क हाथों स बना हुआ था।
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कभी-कभी हम तीनों आपस म झगड भी पडत थे। सुमर और म पहल े
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स ही झगड क मलए मशह र थे। मनोहर बीच म आकर हम शांत कराता था। झगडा
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अक्सर इस बात पर होता था मक कौन झाड ़ू लगाएगा, कौन बतषन धोएगा या
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मकसकी बारी है सब्ज़ी बनाने की। ये छोटे-मोट झगड हमार ररश्ते को और भी
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मज़बूत बनात थे। इन झगडों क बाद हम तीनों एक साथ हाँसत थे और एक-दूसर े
को गले लगाते थे।
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