Page 50 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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तैयारी क साथ गया। मेरा आत्ममवश्वास और नई चीज़ें सीखने की ललक ने शायद
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काम मकया, क्योंमक कुछ मदनों बाद मुझ सूमचत मकया गया मक मरा चयन हो गया
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है। मेरा प्रमशक्षण कि मसहोर क पास एक छोट से गााँव पचामा में था।
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यह मर जीवन का एक मबल्कुल नया अध्याय था। इंजीमनयररंग का
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सपना अधूरा रह गया था, लमकन क ं प्यूटर की दुमनया ने मर मलए एक नई उम्मीद
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जगा दी थी। यह कवल एक मडप्लोमा कोसष नहीं था, बमल्क यह मेर जीवन का
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एक नया मोड था। पचामा म मुझ क ं प्यूटर का तकनीकी ज्ञान ममला, मजसने मेर े
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सोचने क तरीक को बदल मदया। इस कोस ने मुझ मसफ एक नौकरी क मलए तयार
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नहीं मकया, बमल्क मुझ आत्ममनभर बनने और अपने भमवष्य को खुद गढने का
हौसला मदया।
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उस समय मुझ यह एहसास नहीं था मक मर जीवन का वह ‘मनराशाजनक
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पररणाम’ असल म एक वरदान था। अगर मरा चयन इंजीमनयररंग म हो जाता, तो
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शायद म आज कुछ और होता। लमकन उस हार ने मुझ एक ऐसा रास्ता मदखाया,
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जो मर मलए ज़्यादा उपयुि था और मजसने मुझ एक नई पहचान दी। यह घटना
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हमशा मुझ याद मदलाती है मक जब एक दरवाज़ा बंद होता है, तो अक्सर उससे
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कहीं बहतर एक मखडकी खुल जाती है।
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