Page 55 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                                  मेर आदश: श्री संतोर् चौब जी
                                                            े
                                    े
                                            ष
                            ें
                     जीवन म कुछ ऐस क्षण आत हैं, जब एक व्यमि की मुलाकात स    े
                                    े
                                              े
                                                                        ें
                                                              े
              आपकी पूरी सोच और जीवन की मदशा बदल जाती है। आइसक्ट संस्था म अपने
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                                             े
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              प्रमशक्षण (ग्राम पचामा मजला मसहोर ) क दौरान सन 1993 मेर जीवन में भी ऐसा
                                                               ही  एक  क्षण
                                                               आया।  यह  तब
                                                               हुआ  जब  मरी
                                                                           े
                                                                     मुलाकात
                                                                            े
                                                               आइसेक्ट     क
                                                               दूरदशी    और
                                                                   प्रेरणादायक
                                                               मनदेशक,    श्री

                                                                         े
                                                               संतोर्  चौब  जी
                                                               स  हुई।  उनस  े
                                                                े
                                                               ममलना मेर मलए
                                                                        े
                                                             े
               े
              कवल एक औपचाररक मुलाकात नहीं थी, बमल्क यह मेर जीवन क एक नए
                                                                     े
              अध्याय की शुरुआत थी।
                     उस समय, म इंजीमनयररंग म चयन न होने की मनराशा स उबर रहा था
                                                                  े
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                                ैं
              और एक नई शुरुआत की तलाश म था। आइसक्ट ने मुझ एक मौका तो मदया
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                                                            े
                                                    े
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              था, लमकन मर मन म अभी भी भमवष्य को लकर कुछ अमनमितता थी। लमकन
                                                                         े
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              जब म श्री संतोर् चौब जी स ममला, तो उनकी ऊजाष और व्यमित्व ने मुझ पर
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                   ैं
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              गहरा असर डाला। उनक मवचारों में एक स्पिता थी, और उनकी बातों में एक
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              ऐसा आत्ममवश्वास था, मजसने मर अंदर भी एक नई उम्मीद जगा दी।
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