Page 58 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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था, "यहााँ पुराने सीमलंग फन, क ू लर आमद सामान सुधार जात हैं।" यह उस समय
का एक बहुत ही नया और व्यावहाररक मवचार था।
हमारी योजना बहुत सरल थी: हर मंगलवार को जब बाज़ार लगता था,
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तो हम ग्राहकों से खराब सामान लेते थे। मफर कॉलेज क समय क बाद, हम तीनों
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ममलकर उन सामानों को ठीक करने म जुट जात थे। गजराज की दुकान हमारा
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वकशॉप बन गई थी। हम तीनों ने अपने-अपने कौशल का इस्तेमाल मकया और
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महनत स काम को पूरा करत थे। अगल मंगलवार को, जब ग्राहक अपना सामान
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लेने आते थे, तो व ठीक हुआ सामान देखकर बहुत खुश होत थे।
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देखते ही देखत, हमारा यह छोटा सा काम बहुत लोकमप्रय हो गया।
हमारी ईमानदारी और मेहनत की वजह से ग्राहकों का हम पर मवश्वास बढ गया
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था। इससे हमें हर हफ्ते अच्छी इनकम होने लगी थी, जो हमार दोस्तों क साथ
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होने वाले खचे, जैसे हॉस्टल का मकराया और खाने-पीने का खचष, मनकालने क
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मलए काफी थी। यह कवल एक व्यापार नहीं था, बमल्क मर मलए एक बहुत बडी
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सीख थी। इसने मुझ आत्ममनभरता, टीम वक, और यह मसखाया मक कसे सीममत
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संसाधनों क साथ भी बडा काम मकया जा सकता है।
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कॉलेज क वे मदन, जब मैं एक तरफ अथषशास्त् की मकताबें पढता था
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और दूसरी तरफ पंख और कू लर ठीक करता था, मर जीवन क सबस महत्वपूण ष
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और यादगार पल हैं। इस अनुभव ने मुझ मसफ आमथषक ऱूप स ही नहीं, बमल्क
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मानमसक ऱूप स भी बहुत मजबूत बनाया और यह मवश्वास मदलाया मक उनॏयममता
की भावना ही मकसी भी व्यमि को सफल बनाती है।
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