Page 57 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                             कॉलज क मदन: संघर्ष में मछपी उनॏयममता
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                     कॉलेज की मशक्षा का दौर मेर जीवन का एक ऐसा अध्याय था जो ज्ञान
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              क साथ-साथ संघर् और आत्म-मनभषरता की कहामनयों से भी भरा था। पी.जी.
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              महामवनॏयालय मसहोर म बचलर ऑफ आट्षस और मास्टर ऑफ इकोनॉममक्स की
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              पढाई क दौरान, मर सामने सबस बडी चुनौती थी—आमथषक। पररवार से ममलने
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              वाले पैसे मेर रहने, खाने और पढाई क खचों क मलए पयाषप्त नहीं थे। यह एक
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                                                    े
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              ऐसी समस्या थी मजसस जूझत हुए मने महसूस मकया मक अब मुझ खुद ही कोई
              रास्ता मनकालना होगा।
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                     लमकन जीवन म सच्चे दोस्त हमशा संकट क समय ही काम आत हैं।
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              इसी दौर में मेर दो करीबी दोस्त, गजराज मसंह और चेतन वमाष, मेर साथ थे।
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                                                        गजराज की मसहोर में एक
                                                        छोटी सी चाय की होटल
                                                        थी  और  चेतन  की  एक
                                                        सलून की दुकान थी। हम
                                                        तीनों  ने  ममलकर  इस
                                                        समस्या का हल मनकालने
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                                                        का फसला मकया। हमने
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              यह सोचा मक हम अपनी बुमद् और महनत स कुछ ऐसा कर सकत हैं मजसस    े
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              हमारा खचाष मनकल जाए।
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                     हम एक मौका तब ममला जब हमने मसहोर म लगने वाल हर मंगलवार
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                                                        ें
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              क साप्तामहक बाज़ार पर ध्यान मदया। हमने ममलकर एक योजना बनाई। हमने
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              गजराज की चाय की होटल पर एक बडा सा बोड लगा मदया, मजस पर मलखा

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