Page 54 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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अथषशास्त् म प्रवश मलया। अथषशास्त् का मवर्य मर मलए बहुत ही रोचक और
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महत्वपूण था, क्योंमक यह समाज और अथषव्यवस्था क जमटल पहलुओं को
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समझने म मदद करता था। मने पूर समपषण क साथ इस मवर्य की पढाई की और
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सन 1998 तक मने सफलतापूवक दोनों मडग्री प्राप्त कर लीं।
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इन पााँच वर्ों (1993-1997 ) की यात्रा मर जीवन की सबस महत्वपूण ष
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और मनणाषयक यात्रा थी। यह वह समय था जब मने खुद को कवल एक मवनॏयाथी
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क ऱूप में नहीं, बमल्क एक ऐस इंसान क ऱूप म गढा जो चुनौमतयों का सामना
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करने क मलए तैयार था। यह दौर मेर धैयष, अनुशासन और समय प्रबंधन की
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परीक्षा का समय था।
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आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो मुझ अपने इस फसल पर बहुत
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गव होता है। पी.जी. महामवनॏयालय मसहोर ने मुझ जो मशक्षा दी, वह मेर जीवन
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की सबस मजबूत नींव सामबत हुई। बचलर और मास्टर की मडग्री मर मलए कवल
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कागज़ क टुकड नहीं थे, बमल्क व उस समय क संघर्, मेर पररवार क त्याग और
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मर अटूट संकल्प का प्रमाण थे।
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