Page 60 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              दोस्त आपस में एक-दूसर का मुह देख रहे थे, यह सोचत हुए मक अब क्या होगा?
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              हमें कौन पैसे देगा? कसे हम प्रकाश को ठीक करा पाएाँगे? यह एक ऐसी मुमश्कल
              थी, मजसका हमार पास कोई हल नहीं था।
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                     लमकन कहत हैं मक जब मुमश्कल आती हैं, तो भगवान मकसी न मकसी
              ऱूप में मदद भेजता है। ठीक उसी समय, हमें याद आया मक मेर मामा क लडक,
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              श्री मवक्रम मसंह ठाक ु र, उसी मजला अस्पताल म नौकरी करत हैं। हम तुरंत उनक
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              पास गए और उन्हें सारी बात बताई। श्री मवक्रम मसंह ठाकुर ने एक पल भी नहीं
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              सोचा और तुरंत हमारी मदद क मलए तयार हो गए। उन्होंने अपनी नौकरी की
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              परवाह न करत हुए, हम तुरंत एक प्राइवट अस्पताल म ल गए और प्रकाश का
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              ऑपरशन कराया। इस पूर ऑपरशन का सारा खचष उन्होंने अपनी जब स उठाया।
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              उनका यह सहारा हमार मलए एक वरदान था, मजसने प्रकाश की जान बचाई।
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                     प्रकाश क ठीक होने क बाद, हमार सामने एक और चुनौती थी—श्री
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              मवक्रम मसंह ठाकुर का एहसान चुकाना। हम जानत थे मक उन्होंने हमार मलए जो
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              मकया, उसका मोल नहीं चुकाया जा सकता, लेमकन हमने अपनी मेहनत से पैसे
              वापस करने का फसला मकया। प्रकाश, और  पीटर ममलकर घर-घर जाकर
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              टाइल्स और प्लास्टर का काम करना शुऱू मकया। वे कॉलेज क समय क बाद
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              और छुरट्टयों म यह काम करत थे। कुछ ही महीनों की कडी महनत क बाद, हमने
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              सार पैस जमा कर मलए और श्री मवक्रम मसंह ठाकुर को वापस कर मदए।
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                     यह घटना मेर जीवन का एक ऐसा मोड था, मजसने मुझ दोस्ती, पररवार
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              और  इंसामनयत  का  असली  मतलब  मसखाया।  श्री  मवक्रम  मसंह  ठाकुर  की
              इंसामनयत और मर दोस्तों की ईमानदारी ने मुझ यह एहसास मदलाया मक जीवन
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              में सच्ची दौलत पैसा नहीं, बमल्क आपसी मवश्वास और एक-दूसर क प्रमत समपषण
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              होता है।
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