Page 64 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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                                                                        ैं
                                                          े
                                                        े
              सहज स्वभाव की थी। उसने मुझ अपने घर चाय-नाश्त क मलए बुलाया। म थोडा
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              हैरान हुआ, क्योंमक म एक ग्रामीण पृष्ठभूमम स आया था और मर मलए मकसी
                                                                   े
                                                                  े
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              अनजान व्यमि क घर जाना सही नहीं था। मैंने मना कर मदया। लेमकन उसकी
              सरलता और आग्रह म एक ऐसी ईमानदारी थी मक वह लगातार मुझ अगल कई
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                                                                   े
                                                                         े
              मदनों तक आमंमत्रत करती रही। उसक बार-बार आग्रह करने पर, मैंने एक मदन
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              जाने का फसला कर ही मलया। वह मदन 8 जुलाई, 1995 का था।
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                     जब म उसक घर पहुाँचा, तो उसने मेरा पररचय अपने माता-मपता से
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              करवाया। उसक मपताजी, मजनका नाम (बदला हुआ) रघुवीर प्रताप मसंह था, एक
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              बक मनेजर थे और राजस्थान क रहने वाल थे। उन्होंने और उनकी पत्नी ने बहुत
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              ही सम्मान और प्रेम स मरा स्वागत मकया। उन्होंने मुझस मर बार म, मेर पररवार
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                                                        क बार में और मेरी पढाई
                                                         े
                                                                ें
                                                        क बार म पूछा। मने उन्हें
                                                         े
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                                                                       ैं
                                                        सबकुछ  ईमानदारी  स  े
                                                        बताया मक म कहााँ स ह ाँ,
                                                                          े
                                                                   ैं
                                                        मेर मपताजी का स्वगषवास
                                                          े
                                                                         े
                                                        हो चुका है, और मेर बडे
                                                        भाई  सज्जन  मसंह  ठाक ुर
              ही मर मलए मपता समान हैं। मरी बातों को सुनकर व बहुत प्रभामवत हुए।
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                     उस मुलाकात क बाद, हमारी बातचीत का मसलमसला जारी रहा। हम
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                                       ें
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              रोज़ ममलते थे, एक-दूसर स बात करत थे और एक-दूसर को समझने की कोमशश
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              करत थे। सोनू एक बहुत ही समझदार और खुल मवचारों वाली लडकी थी। एक
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              मदन, उसने अचानक मुझस एक बात कही, मजसने मुझ हैरान कर मदया। उसने
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              मुझस अपने मदल की बात कही और मुझ प्रपोज कर मदया। उसने मुझस कहा,
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