Page 69 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                      एक सेममनार मजसन जीवन का मागष बदल मदया
                                         े

                     ( मदनाक 15   अप्रैल 1997  समय प्रातुः 10  बजे )
                     कॉलज की पढाई और आइसक्ट संस्था म क ं प्यूटर प्रमशक्षण क अंमतम
                                                      ें
                                             े
                         े
                                                                      े
              वर्ष में, मरा मन भमवष्य की राहों को लकर अमनमितता स भरा हुआ था। एक
                      े
                                              े
                                                             े
                      ै
              तरफ म बचलर ऑफ आट्षस और मास्टर ऑफ इकोनॉममक्स की मडग्री पूरी करने
                    ैं
                                                                      े
              वाला था, और दूसरी तरफ मर हाथ म क ं प्यूटर मडप्लोमा था। यह मर शमक्षक
                                             ें
                                                                     े
                                       े
                                      े
                                                                        ै
              सफर का एक मनणाषयक मोड था, जहााँ स मुझ यह तय करना था मक मुझ आग  े
                                               े
                                                                        े
                                                  े
                                                        मकस  मदशा  में  बढना  है।
                                                        मैंने  उस  समय  तक  बस
                                                        यही सोचा था मक अच्छी
                                                        मशक्षा  क  बाद  मुझ  एक
                                                                        े
                                                               े
                                                        अच्छी नौकरी ममल जाए
                                                        और मर पररवार क संघर्ों
                                                                      े
                                                             े
                                                              े
                                                                   े
                                                        का अंत हो। लमकन ईश्वर ने
                                                         े
                                                          े
                                                        मर मलए कुछ और ही सोच
                                                        रखा था।
                                                               ठीक उसी समय,
                        े
                े
              मेर जीवन क मागषदशषक, आइसक्ट क दूरदशी और प्रेरणादायक मनदेशक, श्री
                                        े
                                            े
                                                               े
                                                                े
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                                े
                                      े
                                            ें
              संतोर् चौब जी, ने मुझ एक सममनार म आमंमत्रत मकया। यह मर मलए एक बहुत
                                                                         ैं
              बडा सम्मान था। यह सेममनार उनक प्रधान कायाषलय, आइसेक्ट स्कोप कपस,
                                          े
              होशंगाबाद रोड, भोपाल में आयोमजत मकया गया था। पहली बार इतने बड और
                                                                        े
                                                                        े
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                        ैं
                             ें
              आधुमनक कपस म जाकर म बहुत प्रभामवत हुआ। वहााँ का माहौल, वहााँ क लोग
              और वहााँ का उद्देश्य बहुत ही अलग और प्रेरणादायक था।
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