Page 72 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                            मववाह: एक नए जीवन का आरम्भ

                                      (मदनांक 18 अप्रैल 1998)
                                                                   े
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                     जीवन म कुछ ररश्त ऐस होत हैं जो मनयमत िारा मलख जात हैं, और मेरा
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              मववाह भी उन्हीं में से एक था। मेरी उच्च मशक्षा और कररयर क लक्ष्यों क बीच,
                                                                       े
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              एक और महत्वपूण पडाव मरा इंतजार कर रहा था—मववाह। यह मकसी एक
              व्यमि का नहीं, बमल्क दो पररवारों का ममलन था, और इसकी नींव मेर बड भाई
                                                                         े
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                                                              और मेरी पत्नी क
                                                                            े
                                                              दादा  ने  दो  साल
                                                              पहले  ही  रख  दी
                                                              थी।  यह  कहानी
                                                                े
                                                                        े
                                                              मेर जीवन क उस
                                                              दौर की है, जब मैं
                                                              अपने भमवष्य को
                                                              संवारने  म  लगा
                                                                       ें
                                                              हुआ  था,  और
                                                                        े
                                                              पररवार ने मेर मलए
                                                              एक  जीवनसाथी
              का चुनाव कर मलया था।

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                     मववाह की यह यात्रा मेर बड भाई, श्री सज्जन मसंह ठाक ु र, और मेरी
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                                        ैं
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              पत्नी क दादा , श्री गुलाब मसंह सधव, ने दो वर् पूव ही तय कर दी थी। यह हमार  े
                                                      ष
                                                              े
                                                                          ष
              भारतीय समाज की एक बहुत ही खूबसूरत परंपरा है, जहााँ बड-बुजुगों का मनणय,
              उनक अनुभव और दूरदमशता पर आधाररत होता है। मर भया ने मपता की
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              अनुपमस्थमत म एक अमभभावक की भूममका बखूबी मनभाई थी, और उन्होंने मेर  े
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