Page 68 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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उनका समपषण और धैयष अद्भुत था। व हर मवनॏयाथी की समस्या को समझत थे
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और उस हल करने क मलए हर संभव प्रयास करत थे। उन्होंने हम मसफ क ं प्यूटर
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क बटन दबाना नहीं मसखाया, बमल्क हमें यह मसखाया मक कसे इस ज्ञान का
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उपयोग कर हम अपने भमवष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं। उनकी वजह से ही मेर े
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मन म तकनीकी क्षत्र क प्रमत एक गहरी रुमच पैदा हुई।
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आइसक्ट संस्था मर मलए मसफ एक प्रमशक्षण कि नहीं थी, बमल्क वह मेर जीवन
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का एक ऐसा मोड था जहााँ स मने अपने सपनों को एक नई उडान दी। इस संस्था
ने मुझ जो ज्ञान और आत्ममवश्वास मदया, वह मेर मलए एक अनमोल खज़ाना है।
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आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो मुझ यह एहसास होता है मक यमद मुझ े
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इन महान मशक्षकों का मागषदशषन नहीं ममलता, तो शायद मैं अपने जीवन में यहााँ
तक नहीं पहुाँच पाता।
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म श्री फहीम खान और सुश्री उमा शमाष जी का हमशा ऋणी रह ाँगा। उनका
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मसखाया हुआ ज्ञान और उनक मदए हुए संस्कार मर जीवन की सबस बडी पूंजी
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हैं। इस संस्था और इन मशक्षकों क प्रमत मरा हृदय स आभार है मक उन्होंने मुझ े
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एक नया रास्ता मदखाया और मेर जीवन को एक नई पहचान दी।
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