Page 65 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              "मैंने अपने मपताजी और माताजी स पूछने क बाद ही यह प्रस्ताव रखा है।"
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              उसकी बातों म एक ऐसी सच्चाई थी मक मुझ लगा मक वह कोई खल नहीं कर
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              रही है। उसने मुझस मरा मवचार पूछा।
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                     उस पल, मर मदमाग म बहुत सारी बात चल रही थीं। म जानता था मक
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              म एक गााँव क मध्यम वगीय पररवार स ह ाँ। हमार पररवार म शादी का फसला
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              अपनी मजी से नहीं मलया जाता, बमल्क यह फसला बड-बुजुगों का होता है। मर  े
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              मलए मर बड भाई सज्जन मसंह ठाकुर का सम्मान और उनकी आज्ञा सबस ऊपर
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                                                                        े
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              थी। मने उस बहुत ही शांत और सीधे तरीक स समझाया, "मैं एक गााँव का लडका
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              ह ाँ, और हमार पररवार म यह संभव नहीं है मक म अपनी मजी स कोई फसला ल  े
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              सकू। मर मलए मर बड भाई मपता क समान हैं। व जो फसला करग, वही मेर मलए
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              सही होगा।" यह कहकर मैंने उसक प्रस्ताव को मवनम्रता से मना कर मदया।
                     मेर मना करने क बाद भी, सोनू ने मरा साथ नहीं छोडा। हमारी दोस्ती
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              पहले से भी ज़्यादा गहरी हो गई। हम दोनों रोज़ ममलते रहे और बातें करते रहे।
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              यह ररश्ता अब एक ऐस बंधन म बदल गया था जहााँ मसर्फ एक-दूसर क प्रमत
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              सम्मान और सच्चा प्यार था, लेमकन वह प्यार शादी तक नहीं जा सकता था।
              हम दोनों एक-दूसर को समझत थे और एक-दूसर क फसलों का सम्मान करत  े
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                     कुछ वर् बाद, जब साल 1998 आया, तो मेर जीवन में एक और
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              अध्याय की शुरुआत हुई। मर बड भाई ने मर मलए एक ररश्ता तय कर मदया और
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              मरी शादी हो गई। उसी समय सोनू की भी शादी राजस्थान म हो गई। हम दोनों
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              अपनी-अपनी मज़ंदगी म आग बढ गए, लमकन हमारा ररश्ता नहीं टूटा। उस समय
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              मोबाइल फोन और मडमजटल जमाना नहीं था, इसमलए हम दोनों ने एक-दूसर को
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              पत्रों क माध्यम स अपनी मज़ंदगी क बार म बतात रहे।
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