Page 63 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
एक ररश्ता जो पत्र -पमत्रकाओं में मजंदा रहा
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जीवन म कुछ मुलाकात ऐसी होती हैं जो बहुत कम समय क मलए होती
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हैं, लेमकन उनकी यादें जीवन भर साथ रहती हैं। मेर जीवन में भी एक ऐसी ही
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मुलाकात थी, मजसने मुझ मसखाया मक ररश्त कवल शादी स ही नहीं बनत, बमल्क
सम्मान और समझदारी से भी बनते हैं। यह बात तब की है जब मैं 24 साल का
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था, और साल था 1995, मुझ आज भी वह तारीख याद है—8 जुलाई उस
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समय म अपने गााँव स आकर मसहोर म क ं प्यूटर सीखने जाया करता था।
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मरी मदनचयाष बहुत सरल थी। म रोज सुबह ठीक 8 बजे आइसेक्ट क
क ं प्यूटर सटर पर क्लास जाता था, जो इंमग्लशपुरा, मसहोर में बस स्टड क पास
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मस्थत था। मेरा ध्यान मसर्फ पढाई पर था, क्योंमक मैं जल्द से जल्द अपने तकनीकी
ज्ञान को बढाना चाहता था। लेमकन उस रास्ते में मेरा ध्यान एक और बात पर भी
जाता था। आइसेक्ट
सेंटर क पास ही
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इंमग्लशपुरा म एक घर
था। उस घर में एक
लडकी रहती थी,
मजसका नाम मैंने
बाद में जाना मक वह
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(बदला हुआ नाम) सोनू है। वह मुझ रोज़ देखती थी, और मैं भी उसे रोज़ देखता
था। हमारी नज़रों म एक अजीब सी चुप्पी थी, जो मबना कुछ कहे बहुत कुछ कह
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जाती थी।
कुछ मदनों तक यह मसलमसला चलता रहा। मफर एक मदन, जब मैं क्लास
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जा रहा था, तो उसने मुझ रोका और बातचीत शुऱू की। वह बहुत ही सरल और
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