Page 70 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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सममनार का मुख्य एजडा था: "दुरुस्थ ग्रामीण अंचल में तकनीकी मशक्षा का
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प्रचार-प्रसार करना।" यह मवर्य सुनकर मर मन म तुरंत एक गहरा जुडाव महसूस
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हुआ। म खुद एक ग्रामीण पृष्ठभूमम स आता था और मने अपने बचपन म ें
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तकनीकी ज्ञान की कमी को बहुत करीब स देखा था। श्री चौब जी ने अपने
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संबोधन म बताया मक कस हमार देश का एक बडा महस्सा, जो गााँवों में बसता
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है, आज भी आधुमनक तकनीकी ज्ञान स वंमचत है। उन्होंने ग्रामीण युवाओं की
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क्षमता और उनक मलए अवसरों की कमी क बार में बात की। उनकी बातों में
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मसफ तथ्य नहीं थे, बमल्क एक जुनून था, एक सपना था—भारत क हर गााँव में
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ज्ञान की रोशनी पहुाँचाने का सपना।
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चौब जी की बात मर मदल म उतरती चली गई ं । जहााँ म मसफ अपने मलए नौकरी
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और भमवष्य क बार में सोच रहा था, वहीं उन्होंने मुझ एक बहुत बडा उद्देश्य
मदखाया। उन्होंने मुझ यह समझाया मक सच्ची सफलता कवल व्यमिगत मवकास
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में नहीं होती, बमल्क समाज क मवकास म भी होती है। उन्होंने मुझ यह सोचने पर
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मजबूर कर मदया मक मर पास जो तकनीकी ज्ञान है, वह कवल मरी संपमत्त नहीं
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है, बमल्क वह एक ऐसा साधन है मजसस म अपने जस और भी ग्रामीण युवाओं
को सशि बना सकता ह ाँ।
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उस सममनार स प्रेररत होकर मने तुरंत मनिय मकया मक मुझ भी इस ममशन का
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महस्सा बनना है। मैंने यह फसला मकया मक मैं नौकरी की तलाश करने की बजाय,
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अपने ही क्षत्र म एक क ं प्यूटर रमनंग सटर खोलूगा। मरा यह मनणय मर जीवन का
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सबस महत्वपूण मोड था। यह मर मलए कवल एक व्यापाररक फसला नहीं था,
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बमल्क मर जीवन का एक सामामजक और नैमतक संकल्प था। मने महसूस मकया
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मक यह मरी मजम्मदारी है मक म अपने क्षत्र क युवाओं को तकनीकी ज्ञान स जोड ़ू ाँ
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तामक उन्हें भी मर जस संघर्ों का सामना न करना पड।
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