Page 71 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                      ैं
              उस मदन मने मसफ एक नया रास्ता नहीं चुना, बमल्क एक ऐसी यात्रा की शुरुआत
                            ष
                                                                   े
                                  ष
              की, मजसका लक्ष्य मसफ अपनी सफलता नहीं, बमल्क समाज क मवकास में
                                        े
                                                      े
              योगदान देना था। श्री संतोर् चौब जी की प्रेरणा स मुझ अपने जीवन का उद्देश्य
                                                         े
                                                                  ैं
                                                                      े
              ममला और मने अपने सपनों को एक नई मदशा दी। आज जब म पीछ मुडकर
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              देखता ह ाँ, तो मुझ यह एहसास होता है मक अगर वह सममनार नहीं होता, तो
                                                            े
                     ैं
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              शायद म आज कुछ और होता। यह घटना हमशा मुझ याद मदलाती है मक जब
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              हम दूसरों क मलए कुछ करने का सोचत हैं, तो हम अपनी मंमजल अपने आप
              ममल जाती है।
                "खोज रहा था मैं कवल अपने सलए एक अदद नौकरी का दठकाना,
                                 े
                                                      ै
                पर उस एक सेसमनार ने ससखाया, मुझे तो ह सारा समाज
                जगाना।"
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                "िब्दों म उनक जादू था और आखों म एक महान वव़िन, चौबे जी
                                             ँ
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                की प्रेरणा ने कर ददया, मेर जीवन का ही नवननमााण।"
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                "समट्िी की खुिबू रगों म थी, अब हाथों म तकनीक का साथ था,
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                गाव क हर युवा को सिक्त बनाना, अब यही मेरा संकल्प और
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                ववश्वास था।"
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                "15 अप्रल की वो सुबह, जो तकदीर बदलने का पैगाम लाई, स्वयं
                क ववकास से बढ़कर, समाज की सेवा म ही असली जीत ददखाई।"
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