Page 76 - आनंद से अनार तक
P. 76

आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
                                                 े

                        एक अदृश्य सहारा: श्री कलाश मसंह झाला
                                                 ै

                                      (मदनांक 01 जुलाई, 1998)
                     जीवन क कुछ मोड ऐस होत हैं जहााँ सपनों को हकीकत म बदलने क
                            े
                                        े
                                            े
                                                                            े
                                                                    ें
                      ष
                                                        े
              मलए मसफ हौसले ही काफी नहीं होते, बमल्क मकसी क मनस्वाथष सहयोग की भी
                             े
              ज़ऱूरत होती है। मेर जीवन में भी ऐसा ही एक मनणाषयक मोड तब आया जब मैंने
                                 "मशवम इंस्टीट्यूट आइसक्ट" क शुभारंभ का संकल्प
                                                           े
                                                      े
                                 मलया था। गुरुकुल मशक्षा मवकास समममत का गठन हो
                                                              े
                                                 े
                                 चुका था, और हमार पास दूरदराज क ग्रामीण अंचल म  ें
                                 तकनीकी मशक्षा का अलख जगाने का एक स्पि ममशन
                                       े
                                                    े
                                 था। लमकन इन सब क बीच एक बहुत बडी चुनौती
              हमार सामने खडी थी—आमथषक चुनौती।
                  े
                                                े
                     एक मध्यमवगीय पररवार से होने क कारण, मैं जानता था मक इतना बडा
                         े
                                                          े
                          े
              खचष उठाना मर मलए लगभग असंभव था। इंस्टीट्यूट क मलए जगह मकराये पर
              लेना, क ं प्यूटर और अन्य उपकरण खरीदना, और उद्घाटन का खचष—यह सब
                                        े
              हमार सीममत साधनों स बहुत पर था। मर बड भाई और माताजी ने मुझ हमशा
                                                                       े
                                                                          े
                                              े
                                               े
                  े
                                                  े
                                 े
              भावनात्मक और नैमतक समथषन मदया था, लेमकन अब हमें एक ऐसे आमथषक
                                                               े
              सहार की ज़ऱूरत थी, जो इस सपने को साकार कर सक। मुझ नहीं पता था मक
                  े
                                                          े
              यह सहारा कहााँ स आएगा। मर मन म उम्मीद और मचंता दोनों का ही ममश्रण था।
                                     े
                                      े
                            े
                                           ें
              और ठीक उसी समय, जब मुझ सबस ज़्यादा ज़ऱूरत थी, एक ऐसा व्यमित्व मेर  े
                                           े
                                      े
                                    े
              जीवन में आया, मजन्होंने मेर इस सपने को अपना सपना मान मलया। उनका नाम
                                                            े
                                                          े
                    ै
                                        ै
              है श्री कलाश मसंह झाला। श्री कलाश मसंह झाला पेश स एक मशक्षक हैं और
                                                              े
                            ें
                                                                    े
              ग्राम बलाखेडा म एक प्रमतमष्ठत पररवार स संबंध रखत हैं। मरी उनस मुलाकात
                                               े
                                                         े
                                                                       ैं
                       ैं
                            े
              हुई और मने उनक सामने अपनी योजना और अपने सपनों को रखा। मने उन्हें
              66 | P a g e
   71   72   73   74   75   76   77   78   79   80   81