Page 77 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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                                                                      े
              बताया मक म ग्रामीण युवाओं क मलए क्या करना चाहता ह ाँ। उन्होंने मरी बातों
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              को बड ध्यान स सुना, मर उत्साह को महसूस मकया और मर संकल्प को समझा।
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              श्री झाला जी ने एक पल भी नहीं सोचा और तुरंत मरी आमथषक मदद क मलए
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              हाथ बढाया। उन्होंने मुझ वह धनरामश दी मजसकी मुझ सबस ज़्यादा ज़ऱूरत थी।
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                                                                   े
              उनका यह सहयोग कवल पैसों तक सीममत नहीं था, बमल्क वह मेर प्रमत उनका
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              मवश्वास और मरी सोच क प्रमत उनका सम्मान था। उन्होंने मुझ पर जो भरोसा
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              जताया, उसने मर अंदर एक नई ऊजाष का संचार मकया। यह एक ऐसा पल था
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              मजसने मर मन स सारी मचंताओं को हटा मदया और मुझ यह मवश्वास मदलाया मक
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              अब मरा सपना ज़ऱूर पूरा होगा।
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                     अगर उस समय श्री कलाश मसंह झाला जी ने मरी आमथषक मदद नहीं
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              की होती, तो शायद म अपने मशवम इंस्टीट्यूट का शुभारंभ नहीं कर पाता। मरा
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              सपना, जो मसर्फ एक ममशन नहीं था बमल्क मर जीवन का उद्देश्य बन चुका था,
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              शायद अधूरा ही रह जाता। उनका सहयोग मर मलए एक वरदान की तरह था,
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              मजसने मेर सपने को उडान दी। उनका यह उपकार मेर मन में हमेशा रहेगा।
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              आज जब भी म मशवम इंस्टीट्यूट क बार म सोचता ह ाँ, तो मुझ श्री कलाश मसंह
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              झाला जी का चेहरा और उनकी मनस्वाथष मदद याद आती है। उनकी इंसामनयत,
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              उनका समपषण और उनका मेरी दृमि पर मवश्वास, यह सब मेर मलए हमेशा प्रेरणा
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              का स्रोत रहेगा। म मरी आत्मकथा क इस महत्वपूण अध्याय क माध्यम स उनक
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              प्रमत अपना गहरा आभार व्यि करना चाहता ह ाँ। उनका योगदान कवल एक
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              मवत्तीय मदद नहीं था, बमल्क मेर जीवन को एक नई मदशा देने वाला एक अनमोल
              आशीवाषद था।

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