Page 81 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                     इस नए और महत्वपूण कायष की मजम्मदारी मने अपने भतीज श्री लखन
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                                                                    े
              मसंह ठाक ु र को सौंपी। लखन मसंह को यह प्रभार देने का कारण यह था मक मुझ  े
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              उनकी मशक्षा क प्रमत समपषण और उनकी प्रबंधन क्षमता पर पूरा भरोसा था। मुझ  े
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              यह मवश्वास था मक वह न कवल स्कूल का सफलतापूवक संचालन करग, बमल्क
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              बच्चों को भी सही मदशा म मागदशन देंग। उनका नेतृत्व और कडी महनत हमार  े
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              इस नए प्रयास क मलए बहुत ज़ऱूरी थी।
                     भारत स्कूल अगरोद का शुभारंभ हमार मलए मसफ एक स्कूल खोलना
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              नहीं था, बमल्क यह ग्रामीण मवकास क प्रमत हमारी प्रमतबद्ता का प्रमाण था।
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              हम जानते थे मक मशक्षा ही वह सबसे बडा हमथयार है मजससे हम गरीबी और
              मपछडपन को दूर कर सकत हैं। मशवम इंस्टीट्यूट जहााँ युवाओं को आत्ममनभर
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              बना रहा था, वहीं भारत स्कूल बच्चों को एक बहतर भमवष्य की नींव दे रहा था।
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              इस तरह, हमारी समममत का उद्देश्य तकनीकी मशक्षा क साथ-साथ प्राथममक
              मशक्षा तक मवस्तृत हो गया था।
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                     आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो भारत स्कूल की स्थापना का
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              मनणय मुझ बहुत गव स भर देता है। उस समय, यह एक बडा जोमखम था, लेमकन
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              हमने यह कदम उठाया क्योंमक हम जानते थे मक हमार ग्रामीण बच्चों को भी वह
              सब ममलना चामहए जो शहरों क बच्चों को ममलता है। इस स्कूल ने हज़ारों बच्चों
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              क जीवन को संवारा है और उन्हें एक बहतर भमवष्य क मलए तयार मकया है। यह
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              स्कूल आज भी हमार मलए एक प्रेरणा का स्रोत है, जो हमें याद मदलाता है मक
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              एक छोट स गााँव म भी एक बडा सपना देखा और पूरा मकया जा सकता है।
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