Page 83 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                               ैं
                     आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो ताज्जुब होता है मक उस समय
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              मुझम इतनी महम्मत कहााँ स आई? मैंने बाजार से भारी रामश उठाई तामक महेश
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                                                                        ैं
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                                                                  े
              जी की देनदाररयों को चुकता मकया जा सक (उन सहयोमगयों क नाम म यहााँ
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              गोपनीय रखना उमचत समझता ह ाँ)। वह एक ऐसा समय था जब म आमथषक
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              जोमखमों क बीच खडा था, लेमकन मन में एक ही भाव था— 'मकसी का घर
              उजडने से बचाना है'।
              4. बड भैया: साहस का अटूट स्तंभ
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                     इस पूर घटनाक्रम म यमद मर बड भाई श्री सज्जन मसंह ठाक ु र जी का
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              साथ न होता, तो शायद मैं पीछ हट जाता। भैया ने मेरा हाथ पकडकर कहा—
              "अनार, डरो मत, नेक काम में बरकत होती है।" उनकी इसी प्रेरणा और महम्मत
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              ने मुझ उस आमथषक चक्रव्यूह स लडने का हौसला मदया। उन्होंने मसखाया मक
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              जमीन और जायदाद तो आती-जाती रहेगी, लमकन संकट म मकसी का साथ देना
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              ही असली धमष है।
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                     पैस ममलने क बाद महेश पांचाल जी टोंकखुदष छोडकर चल गए। उस
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              समय उनकी आखों म जो कृतज्ञता और राहत क आसू थे, वे मेर मलए मकसी भी
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              मेडल से बड थे।
              4 परोपकार का मवस्तार: बच्चों की मशक्षा का दामयत्व
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                     सौदा खत्म हो गया, मकान मेर पास आ गया, लेमकन महेश जी क
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              पररवार क प्रमत मरी संवदना खत्म नहीं हुई। मकान खरीदने क एक-दो साल बाद
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              जब मुझ उनक पररवार की आमथषक मस्थमत और बच्चों की पढाई क संकट का
              पता चला, तो मैंने एक बार मफर कदम बढाया।
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                     मने महेश जी की सुपुत्री और उनक बच्चों की कॉलेज स्तर तक की
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              पढाई का पूरा खचष उठाने का मनणय मलया। मने उन्हें पढाया और उनक भमवष्य
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