Page 87 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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एक नया अध्याय: उनॏयमी से मशक्षक बनन तक
(21 अगस्त 2001 )
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जीवन म कुछ फसल ऐस होत हैं जो हमारी सारी बनाई हुई योजनाओं
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को बदल देते हैं, और ऐसा ही एक फसला मेर जीवन में भी आया। एक तरफ मैंने
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गुरुक ु ल मशक्षा मवकास समममत क माध्यम से अपने उनॏयमी सपनों को उडान दी
थी। मशवम इंस्टीट्यूट और भारत स्क ू ल की स्थापना क बाद मैं एक मशक्षण
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संस्थान क संस्थापक और संचालक क ऱूप म अपनी पहचान बना चुका था।
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मरा मन और मरा पूरा ध्यान इसी ममशन म लगा हुआ था। मरा मानना था मक म ैं
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मशक्षा क क्षत्र म उनॏयमी बनकर समाज म एक बडा बदलाव ला सकता ह ाँ।
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इसमलए, जब मेर जीवन में एक सरकारी नौकरी का प्रस्ताव आया, तो मैंने उसे
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स्वीकार करने क बार में कभी सोचा भी नहीं था।
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वर् 2001 में, जब म अपने मशक्षण संस्थानों क मवस्तार म लगा हुआ
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था, मेरा चयन शासकीय नौकरी में हो
गया। पद का नाम था संमवदा मशक्षक
वगष-2, और मवर्य था कला संकाय।
मुझ ग्राम गोरवा क शासकीय
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माध्यममक मवनॏयालय में यह नौकरी
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ममली थी। यह खबर मर मलए एक मममश्रत अनुभव लकर आई। एक तरफ यह मर े
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मलए सम्मान की बात थी मक मरी योग्यता को सरकारी तंत्र ने भी मान्यता दी,
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वहीं दूसरी तरफ मरा मन इस नौकरी को स्वीकार करने क मलए तयार नहीं था।
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मैं एक उनॏयमी था, मजसकी सोच हमशा कुछ नया करने और अपने
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मनयमों पर चलने की थी। एक सरकारी नौकरी की सीममत सैलरी और मनमित
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मनयम मुझ अपनी स्वतंत्रता पर एक प्रमतबंध की तरह लग रहे थे। इसक अलावा,
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