Page 90 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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मलए एक खुली मकताब की तरह था, मजसस मने हर मदन कुछ नया सीखा। इसी
तरह, श्री अनवर शाह और श्री सुभार् मतवारी ने भी अपने व्यमित्व और
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कायषशली स मुझ बहुत प्रभामवत मकया। इन तीनों ने ममलकर मुझ यह मसखाया
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मक एक मशक्षक की भूममका मकतनी महत्वपूण होती है।
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इन सभी सहयोमगयों ने मुझ न कवल काम करने क मलए प्रेररत मकया,
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बमल्क उन्होंने मुझ कुछ महत्वपूण मूल्यों को भी आत्मसात करने म मदद की।
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उन्होंने मुझ मसखाया मक मवनॏयालय कवल एक इमारत नहीं, बमल्क एक मंमदर है,
और हम इसक प्रमत पूरी तरह स सममपषत होना चामहए। उनकी प्रेरणा स मने
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मवनॏयालय में बच्चों क सवािंगीण मवकास पर ध्यान देना शुऱू मकया। उन्होंने मुझ े
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यह भी प्रेररत मकया मक मवनॏयालय क वातावरण को बेहतर बनाने क मलए हमें
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अपने स्तर पर भी प्रयास करना चामहए। उन्हीं से प्रेररत होकर मैंने मवनॏयालय में
पेड-पौधे लगाने और उसे साफ-सुथरा रखने की मुमहम शुऱू की।
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यह मेर सहयोमगयों का ही साथ था मक मैं एक सरकारी मशक्षक क ऱूप
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म अपनी मजम्मदाररयों को कु शलता स मनभा पाया। उनका मागदशन, उनकी
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दोस्ती और उनका मवश्वास मर मलए बहुत अमूल्य था। उन्होंने मर उनॏयमी स्वभाव
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को भी एक सही मदशा दी, और मुझ यह मसखाया मक समाज सवा का कायष
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कवल अपनी संस्थाओं तक सीममत नहीं है, बमल्क यह हर जगह और हर समय
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मकया जा सकता है।
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म आज भी इन सभी मशक्षकों का बहुत आभारी ह ाँ। उन्होंने मुझ एक
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सरकारी मशक्षक क ऱूप में ही नहीं, बमल्क एक मजम्मेदार नागररक क ऱूप में भी
तयार मकया। उनका मदया हुआ ज्ञान और उनक मदए हुए संस्कार मर जीवन की
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सबस बडी पूंजी हैं।
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