Page 95 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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यह मर मलए एक बहुत ही मुमश्कल और भावनात्मक दौर था, क्योंमक
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म अपनी भाभीसा क साथ उनकी बीमारी और इलाज क दौरान इंदौर म ही रहा।
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मने उनकी पीडा को बहुत करीब स महसूस मकया। उनक चेहर पर पीडा की हर
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लकीर और उनकी हर सााँस की तकलीफ मेर मदल को छलनी कर देती थी। इन
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मदनों में हमने उनक साथ जो समय मबताया, वह मेर मलए एक ऐसी याद बन गया
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है जो खुशी और दुुःख दोनों स भरी हुई है। हम सबने ममलकर उम्मीद की एक
छोटी सी मकरण को भी थामे रखा था, लमकन मकस्मत को कुछ और ही मंजूर
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था।
जब उन्होंने अंमतम सााँस ली, तो हमार पररवार में एक गहरा सन्नाटा छा
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गया। उनकी मृत्यु का दुुःख मर मलए बहुत गहरा था, क्योंमक मैंने उन्हें इतना करीब
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स संघर् करत देखा था। उनक मनधन स हमार पररवार को एक ऐसी क्षमत हुई है
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मजस कभी पूरा नहीं मकया जा सकता। व न कवल एक अच्छी पत्नी और मााँ थीं,
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बमल्क एक ऐसी भाभी भी थीं, मजनका प्यार और स्नेह हमेशा हमार साथ रहेगा।
उनक जाने क बाद, उनक बच्चे—मवजेंि मसंह ठाक ु र, भंवर मसंह ठाक ु र, और
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बेमटयााँ संगीता, बमबता, पमवत्रा—अनाथ हो गए, और यह देखकर हमारा दुुःख
और भी बढ गया।
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आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो मुझ यह एहसास होता है मक
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भाभीसा का मनधन मर जीवन की एक ऐसी दुखद घटना थी, मजसने मुझ ररश्तों
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का महत्व और जीवन की नश्वरता का गहरा सबक मसखाया। हालांमक व आज
हमार बीच नहीं हैं, लेमकन उनकी यादें और उनका प्यार हमार मदलों में हमेशा
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मज़ंदा रहेगा। यह दुुःखद अनुभव मुझ हमशा यह याद मदलाता है मक पररवार का
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साथ और एक-दूसर क प्रमत समपषण ही जीवन की सबस बडी दौलत है।
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