Page 99 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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म सधव समाज क सकडों लोग मौजूद थे, जो हमारी इस उपलमब्ध को देखने क
मलए आए थे।
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जब मने पहली बार अपने हाथों म छपी हुई पमत्रका ली, तो मेरी आाँखों
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म खुशी क आसू आ गए। मुझ लगा मक यह मसर्फ कागज़ का एक संग्रह नहीं,
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बमल्क यह मर और मर सामथयों क सपनों का एक साकार ऱूप था। उस मदन मुझ े
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एहसास हुआ मक यह मरी मज़ंदगी की सबस बडी उपलमब्ध थी। यह पमत्रका न
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कवल हमार समाज को एक पहचान दे रही थी, बमल्क यह लोगों क बीच प्रेम
और एकता की भावना को भी बढा रही थी। आज भी, जब मैं उन लोगों से
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ममलता ह ाँ जो उस समय उस पमत्रका स जुड थे, तो उनक चेहर पर एक मुस्कान
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आ जाती है। यह पमत्रका आज भी हमारी मेहनत और हमार समाज क प्रमत हमार े
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समपषण की कहानी कहती है।
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