Page 101 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                     हमने अपने छोटे बेट का नाम अवधेश प्रताप मसंह ठाक ु र रखा। यह नाम
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                                                        े
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              मसफ एक नाम नहीं था, बमल्क मेर और मेर पररवार क मलए एक नए भमवष्य की
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              आशा थी। अवधेश क आने स हमार घर म खुमशयों की एक नई लहर दौड गई
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              थी। राज, मेरा बडा बेटा, अपने छोटे भाई को देखकर
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              बहुत खुश था। उसकी आखों म एक अजीब सी
                                    ाँ
              चमक थी, जैसे उसे अपना सबसे अच्छा दोस्त ममल
              गया हो। दोनों भाइयों का प्यार देखकर मुझ बहुत
                                                 े
              संतोर् होता था।
                     अवधेश का जन्म मेर और मेरी पत्नी क
                                                      े
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              मलए एक महत्वपूण सीख थी। हम यह एहसास हुआ
              मक संतान चाहे बटा हो या बटी, वह भगवान का
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              मदया हुआ एक अनमोल तोहफा होता है। महत्वपूण  ष
              यह नहीं है मक वह क्या है, बमल्क यह है मक हम उसे मकतना प्यार देते हैं और
              उस मकतना अच्छा इंसान बनात हैं। अवधेश ने हमार पररवार म एक नई ऊजाष
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              और उत्साह भर मदया। उसकी शरारत और उसकी हाँसी हमार घर का सबस सुखद
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              संगीत बन गई।
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                     आज जब म अपने दोनों बटों को देखता ह ाँ, तो मुझ बहुत गव होता है।
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              राज और अवधेश मर जीवन की सबस बडी दौलत हैं। उन्होंने मुझ एक मपता
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              होने का गौरव मदया है और मेर जीवन को एक नया अथष और उद्देश्य मदया है।
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              अवधेश का जन्म हमार मलए कवल एक नई शुरुआत नहीं थी, बमल्क यह हमार  े
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              पररवार की एक ऐसी तस्वीर को पूरा कर रहा था जो प्यार, खुशी और अटूट
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              बंधन स बनी थी.
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