Page 97 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                     यह कमी हमें बेचैन कर रही थी। एक मदन, हम तीनों दोस्त एक साथ

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              बैठ और इस समस्या पर गहन मवचार-मवमश मकया। तभी सुरि ने एक सुझाव
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              मदया, "क्यों न हम एक पमत्रका शुऱू कर? एक ऐसी पमत्रका जो कवल मनोरंजन
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              क मलए नहीं, बमल्क हमार समाज क मलए हो। जो हमार समाज क लोगों की
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              कहामनयों, उनक संघर्ों और उनकी सफलता की गाथाओं को दशाषए।" राज
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              भंवर मसंह ठाकुर और मने तुरंत इस मवचार का समथषन मकया। हम लगा मक यह
              मसफ एक पमत्रका नहीं होगी, बमल्क यह हमार समाज क मलए एक दपषण का काम
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              करगी।
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                     इस  पमत्रका  को  मूत  ऱूप  देने  क  मलए,  हम  तीनों  ने  अपनी-अपनी
              मज़म्मेदाररयााँ बााँट लीं। राज भंवर मसंह ठाक ु र ने प्रधान संपादक का पद संभाला,
                                                                          ैं
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              क्योंमक उनकी लखन शली और मवचारों म एक अनूठी गहराई थी। सुरि सधव
              ने सह-संपादक क ऱूप में अपना योगदान मदया, क्योंमक उनकी युवा ऊजाष और
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              रचनात्मकता पमत्रका को एक नया आयाम देने वाली थी। और मैंने, डॉ. अनार
                                                             मसंह ठाक ु र, ने प्रबंध
                                                             संपादक का पदभार
                                                             संभाला।      मरी
                                                                           े
                                                             मज़म्मेदारी थी मक मैं
                                                             पमत्रका      को
                                                             प्रकामशत  करने  क
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              मलए सभी ज़ऱूरी व्यवस्थाओं को संभालू।
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                     अब हमार सामने सबस बडी चुनौती थी—समाज क हर कोने तक
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              पहुाँचना। हमने मसर्फ कुछ गााँव तक सीममत रहने का फसला नहीं मकया, बमल्क
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              हमने एक बडा और ऐमतहामसक कदम उठाया। हम तीनों ममत्रों ने ममलकर समाज
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