Page 102 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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                           गोरवा की पगडंमडयों स सात समंदर पार तक

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                                     (एयर इंमडया अवाड - 2006)
              1. गोरवा: जहााँ ममट्टी में जुनून था
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                     वर्ष 2006 की वह सुबह मुझ आज भी याद है। उन मदनों म शासकीय
                                                                    ैं
                                                   े
              माध्यममक मवनॏयालय, गोरवा में एक  मशक्षक क ऱूप में सेवाएाँ दे रहा था। साधन
                                                 सीममत  थे,  मवनॏयालय  की  इमारत
                                                                      े
                                                 साधारण थी और गााँव क बच्चों
                                                 की आाँखों में भमवष्य को लेकर ढेरों

                                                                            े
                                                 सवाल थे। एक अमतमथ मशक्षक क
                                                 ऱूप में मेरा वेतन भले ही कम था,
                                                 लेमकन मेरा हौसला और मशक्षा क
                                                                            े
                                                 प्रमत  मेरा  समपषण  मकसी  भी

                                                 सरकारी पद से कहीं बडा था।
                                                         मैं देखता था मक ग्रामीण

                                                          ें
                                                 अंचलों म मशक्षा को कवल एक
                                                                     े
                                                 बोझ माना जाता था। मेरा लक्ष्य था
              मक इन बच्चों को मकताबों से प्यार हो जाए। मैंने ठान मलया था मक गोरवा की
                                                  ाँ
                                                                          े
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              इन ममट्टी की दीवारों क भीतर स ऐस हीर तराशूगा, मजनकी चमक दुमनया देखगी।
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              2. सीममत संसाधन और असीममत सपने
                     गोरवा में काम करना आसान नहीं था। न मबजली की उमचत व्यवस्था
                                                                           ैं
              थी, न आधुमनक तकनीक। लमकन मने अपनी सोच को आधुमनक रखा। मने
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              बच्चों को मकताबी ज्ञान क साथ-साथ व्यवहाररक मशक्षा देना शुऱू मकया। ग्रामीण
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              पररवश की चुनौमतयों को मने अपनी ताकत बनाया। जब म बच्चों को पढाता
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