Page 103 - आनंद से अनार तक
P. 103

आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
                                                 े

              था, तो मुझ अपनी पीएचडी क शोध मवर्य "दूरस्थ ग्रामीण क्षत्रों में मशक्षा का
                                      े
                       े
                                                                े
              प्रचार-प्रसार" की साथषकता महसूस होती थी।
                     उस समय लोग कहते थे, "डॉक्टर साहब, आप तो पीएचडी होल्डर हैं,

                             ें
                       े
                                                                  ैं
                     े
                                      े
              इस छोट स गााँव म मशक्षक क ऱूप म क्यों समय गंवा रहे हैं?" म बस मुस्कुरा
                                            ें
              देता। मुझ पता था मक बदलाव की नींव वहीं स रखी जाती है जहााँ अभाव होता
                                                   े
                     े
              है।
                               े
                                        ष
              3. 'एयर इंमडया एजुकशन अवाड': एक अचंमभत करने वाली खबर
                     एक मदन मुझ सूचना ममली मक मरी मशक्षण पद्मतयों और ग्रामीण मशक्षा
                               े
                                              े
              म मर योगदान क मलए मुझ 'एयर इंमडया एजुकशन अवाड-2006' क मलए चुना
               ें
                                                                    े
                           े
                                                  े
                 े
                  े
                                   े
                                                            ष
              गया है। यह खबर मकसी सपने जसी थी। कहााँ गोरवा की वो कच्ची पगडंमडयााँ
                                        ै
              और कहााँ 'एयर इंमडया' जैसा वैमश्वक नाम!
                                 े
                     यह पुरस्कार कवल मर मलए नहीं था, बमल्क उन बच्चों की जीत थी
                                       े
                                       े
              मजन्हें दुमनया अक्सर भूल जाती है। जब इस सम्मान की घोर्णा हुई, तो सात
                                            े
                                          े
              समंदर पार तक गोरवा क उस छोट स स्कूल की गूज सुनाई दी। इसने मसद् कर
                                  े
                                                      ाँ
                                                              े
              मदया मक यमद मशक्षक का इरादा नेक हो, तो सुदूर ग्रामीण क्षत्रों म भी ज्ञान का
                                                                  ें
                                  े
              सूरज अपनी पूरी आब क साथ उग सकता है।
              4. सम्मान का वो पल और बदलती सोच
                                                                 े
                     जब मुझ मंच पर सम्मामनत मकया गया, तो मेरी आाँखों क सामने गोरवा
                            े
                                                       े
              क उन बच्चों क चेहर घूम रहे थे। उस पुरस्कार ने मुझ एक बात मसखाई—मेहनत
               े
                          े
                               े
                                               े
              कभी बेकार नहीं जाती। दुमनया आपकी महनत को देख रही होती है, चाहे आप
              मकसी भी कोने में काम कर रहे हों।
                                                                       े
                                            ें
                                    े
                     इस सम्मान ने मुझ समाज म एक नई पहचान दी। जो लोग मुझ कवल
                                                                         े
                                                      े
              एक 'मशक्षक' मानते थे, उनकी नज़रों में अब मेर प्रमत गहरा सम्मान था। इस
              93 | P a g e
   98   99   100   101   102   103   104   105   106   107   108